नरक की भाषा और वैश्विक राजनीति का अंधेरा

सुभाष मिश्रा

एशियाई देशों को ‘नरक कहे जाने का मुद्दा केवल एक विवादास्पद बयान भर नहीं है, बल्कि यह उस गहरे मानसिक ढांचे का संकेत है, जिसमें पश्चिमी प्रभुत्व, नस्लीय दंभ और साम्राज्यवादी दृष्टि आज भी जीवित है। इतिहास गवाह है कि कभी वाइट मेन्स बर्डन जैसे सैद्धांतिक मुखौटे के साथ औपनिवेशिक ताकतों ने दुनिया पर ‘सभ्यता

का दावा किया था। युनाइटेड किंगडम के औपनिवेशिक शासन ने भारत जैसे देशों को ‘सभ्य बनानेÓ की आड़ में शोषण और नियंत्रण की एक लंबी कहानी लिखी। उस दौर में भाषा सभ्य थी, लेकिन मंशा साम्राज्यवादी थी।

आज परिदृश्य बदला है लेकिन मानसिकता के कुछ अंश जस के तस दिखाई देते हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब भाषा का आवरण भी उतरता जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप का भारत और चीन जैसे देशों को ‘नरकÓ कहना इसी परिवर्तन का संकेत है, जहां आधुनिक शक्ति-संतुलन के केंद्र में बैठा नेतृत्व खुलकर हिकारत और विभाजनकारी सोच को अभिव्यक्त कर सकता है।

जब दुनिया के सबसे ताकतवर लोकतंत्र युनाइटेड स्टेट का नेतृत्व इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करता है, तब यह केवल एक देश या दो देशों का अपमान नहीं होता यह उस वैश्विक व्यवस्था पर हमला होता है, जिसने सहयोग, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के जरिए आधुनिक दुनिया का निर्माण किया है।

ट्रंप का तर्क नया नहीं है। प्रवासियों पर आरोप वे नौकरियां छीनते हैं, संस्कृति बदलते हैं, और जन्मजात नागरिकता का दुरुपयोग करते हैं दशकों पुरानी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। लेकिन आज इस तर्क का इस्तेमाल जिस तीखेपन और समय में हो रहा है, वह इसे अधिक खतरनाक बनाता है।

असलियत यह है कि युनाइटेड स्टेट की आर्थिक संरचना का एक बड़ा हिस्सा प्रवासियों की प्रतिभा और श्रम पर टिका हुआ है। सिलिकॉन वैली की तकनीकी कंपनियों से लेकर अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और स्टार्टअप इकोसिस्टम तक भारतीय और चीनी मूल के पेशेवर न केवल सक्रिय हैं, बल्कि नवाचार और विकास के प्रमुख स्तंभ हैं। यदि वे वास्तव में अवसर ‘छीनÓ रहे होते, तो अमेरिकी व्यवस्था स्वयं उन्हें आकर्षित करने के लिए इतनी प्रतिस्पर्धा क्यों करती?

यहां स्पष्ट होता है कि समस्या तथ्यों की नहीं, बल्कि राजनीति की है। राजनीति का सबसे सरल और प्रभावी हथियार है डर। रोजगार का डर, सांस्कृतिक पहचान का डर, और ‘बाहरीÓ के प्रति अविश्वास। यही प्रवृत्ति युनाइटेड किंगडम में ब्रेक्सिट के रूप में उभरी, फ्रांस में दक्षिणपंथी राजनीति के रूप में दिखी, और ऑस्ट्रेलिया में प्रवासियों के खिलाफ बढ़ते असंतोष के रूप में सामने आई। हर जगह कथा एक ही है ‘बाहरी लोग हमारे हिस्से पर कब्जा कर रहे हैं।

भारत भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं है। यहां भी ‘घुसपैठÓ, ‘जनसंख्या संतुलनÓ और ‘स्थानीय बनाम बाहरीÓ जैसे मुद्दे समय-समय पर राजनीतिक विमर्श में उभरते हैं। मंच और संदर्भ बदलते हैं, लेकिन रणनीति वही रहती है डर पैदा करना और उसे समर्थन में बदलना। ट्रंप का बयान इसी वैश्विक अनुदार राष्ट्रवाद का हिस्सा है। यह केवल एक व्यक्ति की राय नहीं, बल्कि उस राजनीतिक प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करता है जो जटिल वास्तविकताओं को नजरअंदाज कर सरल, भावनात्मक और विभाजनकारी नैरेटिव गढ़ती है।
यह और भी चिंताजनक तब हो जाता है, जब दुनिया पहले से ही कई भू-राजनीतिक तनावों से जूझ रही हो। ईरान, इजरायल और युनाइटेड स्टेट के बीच बढ़ता तनाव, युद्ध की आशंकाएं और वैश्विक अस्थिरता इन सबके बीच ऐसी भाषा आग में घी डालने का काम करती है। प्रवासियों के खिलाफ यह विमर्श केवल आर्थिक या सांस्कृतिक बहस नहीं है, यह मानव गरिमा का प्रश्न भी है।

बेहतर जीवन की तलाश में सीमाएं पार करने वाले लोगों को ‘नरकÓ का नागरिक बताना न केवल उनका, बल्कि उस पूरी मानवता का अपमान है, जिस पर आधुनिक सभ्यता की नींव टिकी है।

अंतत: सवाल प्रवासियों का नहीं, बल्कि हमारी राजनीतिक और सामाजिक ईमानदारी का है। क्या हम अपनी आर्थिक असमानताओं और नीतिगत विफलताओं का दोष उन लोगों पर डालना चाहते हैं, जो स्वयं संघर्षरत हैं? क्या हम वैश्वीकरण के लाभ तो चाहते हैं, लेकिन उसकी जिम्मेदारियों से बचना चाहते हैं? डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेता इस विरोधाभास को भली-भांति समझते हैं। वे जानते हैं कि सच्चाई जटिल है, लेकिन डर सरल है और राजनीति अक्सर उसी सरल रास्ते को चुनती है, जो समाज को विभाजित करता है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ऐसी भाषा और सोच को सामान्य न बनने दिया जाए। क्योंकि यदि ‘नरकÓ जैसे शब्द वैश्विक राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गए, तो आने वाले समय में सीमाएं केवल भूगोल में नहीं, बल्कि मनुष्यों के दिलों में खिंच जाएंगी और वह विभाजन किसी भी दीवार से कहीं अधिक खतरनाक होगा।

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