चारामा
छत्तीसगढ़, जिसे देश का ‘पावर हब’ और बिजली सरप्लस राज्य कहा जाता है,उस राज्य के रहवासी खुद अंधेरे और बिजली कटौती की मार झेल रहा है। अप्रैल की चिलचिलाती गर्मी और 40 डिग्री के पारे के बीच अघोषित बिजली कटौती ने आम जनता का जीना मुहाल कर दिया है। स्थिति यह है कि जहाँ कभी 24 घंटे निर्बाध बिजली का दावा किया जाता था, वहां अब 02-02 घंटे तक बिजली आने का इंतजार कर रहे हैं।
नींद हराम: उमस और मच्छरों का डबल अटैक
दिन भर सूरज की तपिश झेलने के बाद लोग रात में सुकून की उम्मीद करते हैं, लेकिन यहाँ भी निराशा हाथ लग रही है। रात को बार-बार होने वाली अघोषित कटौती ने लोगों की नींद हराम कर दी है। दिन में बिजली कटौती से जैसे-जैसे दिन गुजर ही जाता है, लेकिन रात को बिजली गुल होने और गर्मी बढ़ने से और पंखे-कूलर बंद होने से गर्मी में लोगों की नींद ख़राब हो रही हैं,वही लाईट गोल होते ही मच्छरों का हमला शुरू हो जाता है। मच्छरों के कारण मलेरिया और डेंगू जैसी बीमारियों का खतरा बढ़ गया है। बच्चे और बुजुर्ग पूरी रात जागकर गुजारने को मजबूर हैं।
विभाग का ‘ओवरलोड’ बहाना और विफलता
विद्युत विभाग हर बार की तरह इस बार भी वही पुराना राग अलाप रहा है। विभाग के अधिकारीयों का कहना है कि भीषण गर्मी के कारण लोड बढ़ गया है, जिसके चलते ट्रांसफार्मर जल रहे हैं और तार टूट रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि जब हर साल गर्मी आती है, तो विभाग ने इन सबका पहले से मेंटेनेंस क्यों नहीं किया,नए इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रांसफार्मर की क्षमता बढ़ाने में विभाग विफल क्यों नजर आ रहा है,सरप्लस बिजली होने के बावजूद प्रबंधन में इतनी बड़ी चूक कैसे हो रही है,
सड़कों पर सन्नाटा, घरों में आक्रोश
दोपहर की गर्मी से सड़कें पहले ही सूनी हैं, और अब बिजली की किल्लत ने घरेलू कामकाज से लेकर छोटे व्यापार तक सब कुछ चौपट कर दिया है। जनता में भारी आक्रोश है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि बिल तो समय पर और बढ़कर आते हैं, लेकिन सुविधा के नाम पर सिर्फ अंधेरा और नुकसान मिल रहा है।हम बिजली सरप्लस राज्य में रहते हैं, यह सुनकर गर्व होता था। लेकिन आज की स्थिति देखकर शर्म आती है। रात भर बच्चों को हाथ वाले पंखे से हवा करनी पड़ती है।
सरकार और बिजली विभाग को यह समझना होगा कि बिजली अब विलासिता नहीं, बल्कि इस जानलेवा गर्मी में एक जरूरत है। यदि जल्द ही ओवरलोड की समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकाला गया, तो जनता का यह आक्रोश सड़कों पर उतर सकता है।