बस्तर। केंद्र और राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘जल जीवन मिशन’ बस्तर के ग्रामीण इलाकों में बदहाली का शिकार हो गई है। “हर घर जल” पहुँचाने का सपना देख रहे ग्रामीणों के नसीब में अब भी दूर-दराज के नालों और हैंडपंपों का चक्कर काटना ही लिखा है। जिले के सैकड़ों गांवों में योजना का क्रियान्वयन कागजों पर तो चमक रहा है, लेकिन धरातल पर आधी-अधूरी पाइपलाइन और सूखी टंकियां विभाग के दावों की हवा निकाल रही हैं।
टंकियां खड़ी पर जल स्रोत का अता-पता नहीं
बस्तर के कई संवेदनशील और दूरस्थ गांवों में जल जीवन मिशन के तहत विशाल पानी की टंकियों का निर्माण तो कर दिया गया है, लेकिन सबसे बड़ी लापरवाही यह है कि इन टंकियों को भरने के लिए जल स्रोत (Water Source) की व्यवस्था ही नहीं की गई। कई जगहों पर बोर खनन तो हुआ पर पानी नहीं निकला, इसके बावजूद ठेकेदारों ने स्ट्रक्चर खड़ा कर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली। ग्रामीण बताते हैं कि आलीशान टंकियां सिर्फ दिखावे की वस्तु बनकर रह गई हैं, जबकि उनके नीचे लगे नलों ने आज तक पानी की एक बूंद नहीं देखी।
तीन साल बाद भी काम अधूरा, पाइपलाइन बिछाकर भूले ठेकेदार
योजना को शुरू हुए तीन साल से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन बस्तर जिले में अब तक 50 प्रतिशत काम भी पूर्ण नहीं हो पाया है। कई पंचायतों में ठेकेदारों ने सड़कों को खोदकर पाइपलाइन तो बिछा दी, लेकिन उन्हें मुख्य सप्लाई लाइन या टंकी से जोड़ा ही नहीं गया। खोदी गई सड़कों के कारण ग्रामीणों का चलना दूभर हो गया है और घरों के सामने लगे स्टैंड पोस्ट (नल) केवल जंग खा रहे हैं। निगरानी की कमी का फायदा उठाते हुए ठेकेदार काम को बीच में ही छोड़कर गायब हो गए हैं।
ग्रामीणों की टूटती उम्मीदें और बढ़ती मुश्किलें
बस्तर के ग्रामीण क्षेत्रों में जल संकट एक बड़ी समस्या रही है। जब जल जीवन मिशन की शुरुआत हुई, तो लोगों को लगा कि अब उन्हें पानी के लिए मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। लेकिन महीनों और सालों के इंतजार के बाद भी जब पानी नहीं मिला, तो ग्रामीणों का आक्रोश बढ़ रहा है। भीषण गर्मी के दस्तक देते ही महिलाएं अब भी मीलों दूर से पानी ढोने को मजबूर हैं। उनका आरोप है कि अधिकारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण सरकारी पैसा पानी की तरह बहाया जा रहा है, लेकिन प्यास बुझाने के लिए उनके पास कोई ठोस साधन नहीं है।
निगरानी तंत्र फेल, योजना दम तोड़ती नजर आ रही
इस पूरी अव्यवस्था के पीछे विभाग के तकनीकी अमले और उच्चाधिकारियों की लापरवाही साफ नजर आती है। ठेकेदारों की मनमानी पर लगाम कसने के लिए कोई प्रभावी सिस्टम नजर नहीं आ रहा है। बिना काम पूरा किए भुगतान की खबरें भी अक्सर चर्चा में रहती हैं। बस्तर जैसे चुनौतीपूर्ण भूगोल में जहाँ पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करना प्राथमिकता होनी चाहिए थी, वहां यह महत्वाकांक्षी योजना प्रशासनिक निष्क्रियता और भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है।