हाईकोर्ट का बड़ा फैसला : 5 महीने से अधिक का भ्रूण भी ‘इंसान’, हादसे में मौत पर परिवार को मिलेगा अलग से मुआवजा

प्रयागराज। अजन्मे बच्चों के कानूनी अधिकारों को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि गर्भ में पल रहा बच्चा 5 महीने (20 सप्ताह) से अधिक की आयु का है, तो कानून की नजर में उसे एक जीवित व्यक्ति माना जाएगा। ऐसी स्थिति में, किसी दुर्घटना के दौरान भ्रूण की मृत्यु होने पर पीड़ित परिवार अलग से मुआवजे की मांग कर सकता है।

क्या था पूरा मामला?
यह कानूनी विवाद साल 2018 की एक दुखद घटना से शुरू हुआ था। भानमती नाम की एक महिला, जो 8-9 महीने की गर्भवती थीं, ट्रेन में चढ़ते समय अचानक पैर फिसलने से गिर गईं। इस हादसे में वह गंभीर रूप से घायल हो गईं और अस्पताल में इलाज के दौरान उन्होंने और उनके अजन्मे बच्चे ने दम तोड़ दिया।

रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) ने महिला की मौत पर तो 8 लाख रुपये का मुआवजा मंजूर किया, लेकिन कोख में मरे बच्चे के लिए अलग से राहत देने से साफ मना कर दिया। अधिकरण का तर्क था कि भ्रूण को एक अलग इकाई या ‘व्यक्ति’ नहीं माना जा सकता।

हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच की अहम टिप्पणी
न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार की पीठ ने इस मामले की गहराई से सुनवाई करते हुए अधिकरण के पुराने फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने कहा:

कानूनी मान्यता: 5 महीने से ऊपर का भ्रूण केवल शरीर का हिस्सा नहीं, बल्कि एक ‘कानूनी व्यक्ति’ है।

मुआवजे का हक: चूंकि बच्चा एक स्वतंत्र इकाई के रूप में देखा जाएगा, इसलिए उसकी मौत पर परिवार को अलग से हर्जाना मिलना चाहिए।

न्याय की जीत: कोर्ट ने परिवार की अपील स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि रेलवे को अब उस अजन्मे बच्चे की जान जाने के बदले भी मुआवजा देना होगा।

असर और महत्व:
यह फैसला भविष्य में होने वाले दुर्घटना दावों के लिए एक नजीर (उदाहरण) बनेगा। अब तक गर्भ में पल रहे बच्चों की मौत को अक्सर मां की चोट का ही हिस्सा माना जाता था, लेकिन इस फैसले ने कोख में पल रही जान को एक नई कानूनी पहचान दे दी है।

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