वॉशिंगटन/तेहरान। अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़े भीषण संघर्ष ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की नींव हिला दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में महज 15 दिनों के भीतर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में 41% से ज्यादा का जबरदस्त उछाल आया है। इस तनाव का सबसे खतरनाक असर एशियाई देशों की ऊर्जा आपूर्ति और आम आदमी की जेब पर पड़ने की आशंका गहरा गई है।
क्यों लगी तेल की कीमतों में आग?
आंकड़ों के मुताबिक, युद्ध शुरू होने से ठीक पहले यानी 27 फरवरी को कच्चा तेल 73 डॉलर प्रति बैरल पर स्थिर था। लेकिन जैसे ही अमेरिका और इजराइल ने ईरान के सैन्य ठिकानों पर सीधे हमले किए, बाजार का संतुलन बिगड़ गया। शनिवार तक तेल की कीमतें बढ़कर 103 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गईं। यानी केवल दो हफ्तों में एक बैरल पर 30 डॉलर की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
क्या ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ बना संकट की वजह?
दुनिया के कुल तेल व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा ‘स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज’ (Strait of Hormuz) जलडमरूमध्य से होकर गुजरता है। युद्ध के कारण इस प्रमुख सप्लाई रूट पर जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित हुई है। विशेषज्ञों की मानें तो अगर यह रास्ता लंबे समय तक बाधित रहा, तो वैश्विक स्तर पर तेल की भारी किल्लत हो सकती है, जिससे पेट्रोल-डीजल के साथ-साथ महंगाई भी रॉकेट की तरह बढ़ेगी।
भारत के लिए बढ़ी मुश्किलें
चूंकि भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात (Import) करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में आया यह 30 डॉलर का उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए किसी झटके से कम नहीं है। यदि कीमतें इसी स्तर पर टिकी रहीं, तो देश में ईंधन की कीमतों में वृद्धि के साथ-साथ माल ढुलाई महंगी हो जाएगी, जिसका सीधा असर रोजमर्रा की चीजों के दामों पर पड़ेगा।