
सरिता सिंह
शादी के कई बरस गुजर जाने के बाद आज भी मैं उन दिनों को भूला नहीं पाती, जब विजय मुझे देखने आये थे। विजय के बारे में मुझे मालूम था किवे एक कवि हैं और यहीं बात मुझे उनसे जोड़ रही थी। जब वे मुझे देखने घर आये थे। तब मैं कालेज गई हुई थी। माँ ने कालेज में ख़बर भिजवाया कितुम्हें देखने जगदलपुर वाला लड़का आया है, जल्दीआओ। मेरा कालेज घर के पास पड़ता था, इसलिए मैं तुरन्तघर पहुंच गई थी। घर पहुँचते ही मैंने दरवाजे की ओट से विजयको देखा और उनमें कवि होने को ढूंढ रही थी।
मुझे बचपन से लिखने-पढ़ने का शौक था और कभी-कभार कुछ लिख भी लिया करती थी। विजय से जब मेरा रिश्तापक्काहुआ था तब मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा, जैसे मुझे मन माँगी मुराद मिल गई थी। जब हम विवाह बंधन में बंधे मैं एम. काम अंतिम वर्ष की परीक्षादे रही थी। परीक्षाके बीच हमारी शादी हुई। जिसके चलते एक परचा मुझे विजय के घर पहुंच कर देना पड़ा।
सगाई के चार महीनें पश्चात हम विवाह बधंन में बंध गये थे। इन चार महीनों में मुझे विजय के खूब पत्र मिले थे जिसमें मेरी पढ़ाई की हिदायतों के साथ उनकी खिड़की जहां बैठकर वे कविता लिखते हैं, खिड़की से उनको ताकने वाली बंद टाकीज़, रफीक गद्देवाले का खप्पर, मुहल्लेका इकलौता नारियल का पेड़, इन्द्रावती नदी का पुराना पुल, सीरासार चौक, दशहरे का रथ और घर के लोगों का स्वभाव, दोस्तों, सूत्र पत्रिका और अपने रंगमंचीय गतिविधियों के बारे में लिखा करते थे। मैं उनके पत्रोंसे उनके घर के लोगों, उनके दोस्तों, उनकी खिड़की और कविता के विषय और रंगमंच की गतिविधियों को जानने समझने लगी थी, इसलिए शादी के बाद जब मैं विजय के घर के पहुंची तब मुझे कुछ भी नया नहीं लगा।
विजय अपने धुन के पक्केव्यक्तिहैं, उनके जीवन में रचना-साहित्यऔर रंगमंच का स्थान सबसे ऊपर है। इसी में अपना सर्वस्वलुटाते हैं। जब शादी के बाद घर आई तो देखा इनका बैंक बैलेन्सनील है। जब मैंने इनसे पूछा आपने अपने भविष्यके लिये कुछ नहीं जोड़ा, तो सहज होकर जवाब दिया अब तुम आ गई हो, यह जिम्मेदारी तुम्हें उठानी है। नौकरी से जो भी पैसा मिलता उसे वे नाटक और सूत्र पत्रिका सहित सृजनात्मक गतिविधियों में लगाते रहे हैं, आज भी वे सृजनात्मक गतिविधियों के लिये आर्थिक सहयोग माँगने के लिए किसी के पास खड़े होने में हिचकते हैं, दोस्तों और खुद पर उन्हें अधिक विश्वास है। इसी विश्वास के बल पर इन्होंने सूत्र पत्रिका को देश के साहित्यिक जगत में एक मुकाम पर पहुँचा दिया है।

विजय घर में खाली बैठना पसंद नहीं करते जब भी वे घर में होते हैं कुछ न कुछ लिखते-पढ़ते रहते हैं। मैंने देखा है जब वे पढ़ने बैठते हैं तो दूसरा काम भूल जाते हैं उसी तरह लेखन को लेकर भी है जब वे कुछ लिखने के लिये बैठते हैं खाना-बिना तक भूल जाते हैं। मैंने महसूस किया है उन्हें अपना लिखा कभी संतुष्टनहीं कर पाता, इसलिए लिख लिख कर कागज फाड़ते रहते हैं जब वे अपने लिखे से संतुष्टहोते हैं, उनके चेहरे की चमक से मैं समझ जाती हूँ किउन्होंने अपना लिखा पूरा कर लिया है। कई बार अपना लिखा मुझे पढ़कर सुनाते हैं, यदिमैं ध्यान से नहीं सुनती तो खीझ उठते हैं–सुनना है, तो सुनो अन्यथा उठो यहां से…
छपने को लेकर विजय ज्यादा उत्सुक नहीं रहते, जब दोस्तों और मित्रोंका आग्रह होता है तो अपनी
सामग्रीछपने के बाहर भेजते हैं उनका कहना है मुझे अभी और अच्छालिखना है, सिर्फ छपने और नाम होने के लिये मैं लिख नहीं सकता…मुझे विजय की जीवटता अच्छीलगती है सृजनात्मक कार्यों के लिए विजय जूझने से नहीं डरते कई बार एक साथ बहुत सारी जिम्मेदारी उठा लेते हैं तब मैं नाराज होती हूं तो हँस देते हैं। हांलाकिवे अपने सभी कार्यो को पूरी प्रतिबद्धता से पूरा करते हैं। कई बार मैं सोचती हूं एक अकेला आदमी कैसे एक साथ इतना काम कर लेता है। कभी पत्रिका निकालनी है, तो कभी सूत्र सम्मान की तैयारी करनी है तो कभी बच्चोंके लिये रंग कार्यशाला लगाना है, फिर आये ढेरों पत्रोंके नियमित जवाब देना फिर अपनी नौकरी की जिम्मेदारी को भी अनुशासित ढंग से निभाते हैं। विजय, चुप बैठकर
रहने वाले व्यक्तिनहीं हैं, वे रचना के लिये प्रतिबद्ध व्यक्तिहैं कुछ न कुछ नये सृजन में लगे रहते हैं।
विजय स्वभावसे एकदम सरल हैं और ऐसे लोगों से ही उनकी खूब जमती है जो कहना है साफ साफ कहते हैं इसलिए कई बार लोग इनसे नाराज़ भी हो जाते हैं लेकिन ये परवाह नहीं करते। इनके साहित्यिक कार्यों में मेरी पूरी हिस्सेदारी होती है मुझसे हमेशा राय भी लेते हैं। अपने मित्रोंका वे खूब सम्मान करते हैं और इन सब के साथ मिलकर ही सूत्र को इन्होंने एक नई पहचान दी है। विजय दोस्तों को खूब पत्र लिखते हैं सूत्र की सक्रियता में इनके दोस्तों का निश्छल सहयोग हमेशा रहा है… इनके जीवन में मित्रोंकी बहुत अहमियत है इन्हें ही वे अपना घर परिवार मानते हैं।
घर की सारी जिम्मेदारी मैं उठाती हूँ। इसलिए इधर वे बेफ्रिक रहते हैं। सूरज और यश के तो वे दोस्तहैं। जब कभी घर में खाली रहते हैं, तब वे बच्चोंको बाहर घूमा लाते हैं और घर में उनके साथ खूब मस्तीकरते हैं। विजय, सूरज और यश की पढ़ाई लिखाई में सख्तीके खिलाफ हैं, उनका कहना है अभी ये छोटेहैं, अभी से इन पर पढ़ाई का बोझ
लादकर इनके बचपन को छीनना नहीं है बल्किहर साहित्यिक-नाटकों के कार्यक्रम में सूरज-यश को साथ ले जाते हैं… सूरज और यश तो अपने बचपन से उनके बाल नाटकों में काम कर रहे हैं। सूरज और यश अब बड़े हो गये हैं लेकिन विजय, उन्हें अपना दोस्तमानते हैं, और दोस्तों की तरह दोनों के साथ मस्तीभी करते रहते हैं।
विजय, जितने भावुक हैं उतने ही गुस्सैल भी, हांलाकिउनको गुस्साकम ही आता है… आता है तो बहुत ही आता है फिर जल्दीअपने को संभाल भी लेते हैं…वैसे विजय सबको साथ लेकर चलने में यकीन करते हैं, उनकी चिंता में खूब सारे लोग रहते हैं, लेकिन अपनी चिंता करते विजय को मैं कम ही देख पाती हूँ।