छत्तीसगढ़ का साहित्यिक इतिहास भाषा, संस्कृति और क्षेत्रीय अस्मिता को दर्शाता है, जिसमें लोकपरंपराओं और आधुनिक संवेदनाओं का सुंदर मिश्रण है, जो इसे एक समृद्ध और जीवंत साहित्य बनाता है. हालांकि छत्तीसगढ़ के आरंभिक साहित्यिक विस्तार मे पुरुषों का वर्चस्व रहा, लेकिन देर नहीं लगी कि छत्तीसगढ़ की महिला साहित्यकारों ने साहित्य के विस्तृत मंच पर अपनी पैठ बना ली.
यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि छत्तीसगढ़ की स्त्री लेखिकाओं की रचनाशीलता की बदौलत यहाँ स्त्री साहित्य लोक कलाओं, कथाओं और संवेदनाओं से शुरू होकर अब स्त्री से जुड़े उनके आधुनिक विमर्शों तक पहुँच चुका है. आज कई महिला साहित्यकार विभिन्न विधाओं (कहानी, कविता, निबंध) में सक्रिय हैं और छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति को आगे बढ़ा रही हैं जिसमे श्रीमती उर्मिला शुक्ल और जया जादवानी का जिक्र किया जाना आज विशेष इसलिए है कि उक्त लेखिकाओं की रचनाएं विश्व पुस्तक मेला 2026 मे दर्ज होकर साहित्यकारों के विश्व मंच पर छत्तीसगढ़ की मौजूदगी दर्ज कर रहीं हैं.

उर्मिला शुक्ल : हाशिये की आवाज़ को साहित्य का केंद्र

समकालीन हिंदी साहित्य में उर्मिला शुक्ल एक ऐसी रचनाकार के रूप में उभरती हैं, जिनका लेखन सामाजिक शिष्टाचार की सतही परतों को भेदते हुए मनुष्य की अस्वीकृत पहचानों तक पहुँचता है. उनकी रचनात्मक यात्रा अनुभव, संवेदना और वैचारिक साहस के त्रिकोण पर टिकी है. वे उन आवाज़ों को शब्द देती हैं, जिन्हें समाज प्रायः अनसुना कर देता है.
उर्मिला शुक्ल का साहित्य किसी एक विमर्श का अनुकरण नहीं करता, बल्कि वह देह, लिंग, पहचान और सामाजिक बहिष्करण जैसे प्रश्नों को मानवीय गरिमा के साथ उठाता है.
विश्व पुस्तक मेला 2026 मे उर्मिला शुक्ल जी द्वारा रचित एक नए उपन्यास का लोकार्पण हुआ जिसका नाम है “मैं बृहन्नला – देहकारा का प्रेत”. लेखिका की यह कृति लेखिका की उक्त वर्णित वैचारिक प्रतिबद्धता का सशक्त उदाहरण है. यह केवल एक उपन्यास नहीं, बल्कि भारतीय समाज की उस अदृश्य पीड़ा का सजीव दस्तावेज़ है, जिसे अक्सर ‘हाशिये’ के अंधेरे में धकेल दिया जाता है. यह कृति सामाजिक यथार्थ के बीच खड़ी होकर देह, पहचान के संघर्ष को उकेरने का एक गंभीर प्रयास है. एक ऐसा विषय है, जो आज के समय में अत्यंत आवश्यक और प्रासंगिक है.
यह उपन्यास थर्ड जेन्डर जिन्हें समाज हिजड़ा, किन्नर,खोजा आदि नामों से पुकारता है, की पहचान और अस्तित्व की महत्ता पर हमे सोचने पर मजबूर करता है. परिवार इन्हें अपना वंश नहीं मानता और समाज इंसान नहीं मानता. ऐसाक्यों? क्या गलती है इनकी? इसी क्यों की तलाश के लिए आप इस उपन्यास को जरूर पढ़ना चाहेंगे. भावना प्रकाशन नयी दिल्ली से प्रकाशित इस उपन्यास का मूल्य मात्र 350/- रुपये है जिसे आप फिलहाल प्रकाशक के स्टॉल से खरीद सकते है.
उर्मिला शुक्ल : मैं बृहन्नला – देहकारा का प्रेत
विधा – उपन्यास
मूल्य – 350 /-
भावना प्रकाशन नई दिल्ली
उर्मिला शुक्ल की कविताओं का एक संग्रह “रैम्प पर चलती लड़कियां” का भी विमोचन विश्व पुस्तक मेला 2026 मे किया गया है जिसका प्रकाशन वनिका पब्लिकेशन नयी दिल्ली ने किया है. उर्मिला शुक्ल जी के अनुसार इस कविता संग्रह की कविताएं हमारे समय और समाज का एक दस्तावेज हैं. ये स्त्री की विविध स्थितियों के चित्र उकेरती हैं. इसमें एक ऒर नगर और महानगर की स्त्रियां हैं, तो दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के जंगल की आदिवासी स्त्रियां भी हैं जो विमर्श नहीं करतीं,जीवन को जीती हैं जीवन की तरह. इस कविता संग्रह को आप मात्र 250 रुपये का मूल्य अदा कर अपने साथ घर ला सकते है और अलग-अलग तरीके के जीवन जीती स्त्री का चित्र अपने दिलो-दिमाग पर उकेर सकते हैं.
कविता संग्रह रैम्प पर चलती लड़कियां
मूल्य 250/-
वनिका पब्लिकेशन नई दिल्ली
“मुहब्बत, भाषा और वतन की कहानी: जया जादवानी का उपन्यासिक संसार”

जया जादवानी पिछले तीन दशक से सृजनरत हैं. अब तक उनके तीन कविता-संग्रह ‘मैं शब्द हूँ’, ‘अनन्त सम्भावनाओं के बाद भी’, ‘उठाता है एक मुट्ठी ऐश्वर्य’; छह कहानी-संग्रह ‘मुझे ही होना है बार-बार’, ‘अन्दर के पानियों में कोई सपना काँपता है’, ‘उससे पूछो’, ‘समन्दर में सूखती नदी’, ‘ये कथाएँ सुनाई जाती रहेंगी हमारे बाद भी’, ‘अनकहा आख्यान’ और पाँच उपन्यास ‘तत्त्वमसि’, ‘मिठो पाणी खारो पाणी’, ‘कुछ न कुछ छूट जाता है’, ‘देह कुठरिया’, ‘काया’ प्रकाशित हैं. कुछ यात्रा-वृत्तान्त भी लिख चुकी हैं. सिन्धी में भी उनकी पाँच किताबें प्रकाशित हैं. उन्होंने ‘कृष्णमूर्ति टू हिमसेल्फ़’ और सिन्धी कविता-संग्रह ‘भगत’ का हिन्दी अनुवाद किया है. उनकी कई रचनाओं का अंग्रेज़ी, सिन्धी, उर्दू, पंजाबी, बांग्ला, मराठी और अन्य भाषाओं में अनुवाद हो चुका है. उनकी कहानी ‘अन्दर के पानियों में कोई सपना काँपता है’ पर टेलीफ़िल्म बनी है.
विश्व पुस्तक मेला 2026 मे जया जादवानी जी द्वारा रचित एक नए उपन्यास का लोकार्पण हुआ जिसका नाम है “इस शहर में एक इतर शहर था”. जया जादवानी का यह उपन्यास “इस शहर में एक इतर शहर था” केवल एक कथा नहीं, बल्कि समय, स्मृति और स्त्री-अनुभवों की परतों से बुना हुआ एक संवेदनात्मक दस्तावेज़ है. यह कृति उस अदृश्य शहर की तलाश है, जो भौगोलिक नक्शों पर नहीं, बल्कि मनुष्यों के भीतर,उनकी स्मृतियों, इच्छाओं, असुरक्षाओं और प्रतिरोधों में बसता है.
जया जादवानी समकालीन हिन्दी साहित्य की एक संवेदनशील और वैचारिक रूप से सजग लेखिका हैं. उनका रचनात्मक संसार मुख्यतः स्त्री-अनुभव, शहरी यथार्थ, स्मृति और पहचान के प्रश्नों के इर्द-गिर्द घूमता है. उन्होंने कथा-साहित्य के साथ-साथ आलोचनात्मक लेखन और स्तंभ-लेखन के माध्यम से भी हिन्दी साहित्य में अपनी विशिष्ट उपस्थिति दर्ज की है.
जादवानी ने तत्वमसि, कुछ न कुछ छूट जाता है, मिट्ठो पाणी, खारो पाणी इत्यादि उपन्यासों के माध्यम से भी भाषाई और सामाजिक सीमाओं को छुआ है. उनकी कविताएँ और कहानियाँ स्त्री-स्वर, सामाजिक संवेदनशीलता तथा स्थानीय-परमपरा की गूंज लिए रहती हैं, यही कारण है कि उनकी रचनाएँ आलोचक और पाठक दोनों के बीच गहन चर्चा का विषय रही हैं.
राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास देर तक स्मृति में ठहरने वाला साहित्यिक अनुभव है, ठीक उस ‘इतर शहर’ की तरह, जो पढ़ लेने के बाद भी भीतर बस जाता है। संक्षेप में कहा जाए तो यह उपन्यास जया जादवानी की संवेदनशील लेखनी का सशक्त उदाहरण है, एक ऐसा साहित्यिक प्रयास, जो पाठक को अपने भीतर बसे “इतर शहर” से रूबरू कराता है।
उपन्यास “इस शहर में एक इतर शहर था”
मूल्य 250/-
राजकमल प्रकाशन नई दिल्ली