क्या हाउसिंग बोर्ड के दिन बहुरेंगे !

क्या हाउसिंग बोर्ड के दिन बहुरेंगे !

बोर्ड अपनी गुणवत्ता और विश्वसनीयता कायम कर पाएगा

छत्तीसगढ़ में हाउसिंग बोर्ड का नाम आते ही आम नागरिक के चेहरे पर जो भाव उभरते हैं, वे किसी सरकारी संस्था के प्रति भरोसे का नहीं, बल्कि एक लंबी और थकाऊ जद्दोजहद का प्रतीक हैं। कभी यह संस्था लोगों के सपनों को पक्का आकार देने वाली मानी जाती थी, लेकिन समय के साथ इसकी कॉलोनियाँ गुणवत्ता की जगह जर्जरता का नाम बन गईं। इसीलिए हाल के वर्षों में एक सवाल जोर से उठने लगा, क्या हाउसिंग बोर्ड को बंद कर देना चाहिए?

इसी बहस के बीच मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने बोर्ड के 2060 करोड़ रुपये के नये आवासीय पैकेज की घोषणा की है और कहा है कि संस्था को नई जिंदगी देने का यह निर्णायक समय है। उनका यह बयान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भी है, क्योंकि यह स्वीकारोक्ति है कि बोर्ड के कामकाज में समस्या रही है। यह किसी भी मुख्यमंत्री के लिए आसान नहीं होता कि वह सार्वजनिक मंच पर संस्था की कमजोरियों को परोक्ष रूप से स्वीकारे साय ने यह जोखिम लिया है, जो उनकी राजनीतिक ईमानदारी की तरफ इशारा करता है।
उन्होंने कहा कि बोर्ड पर वर्षों से चढ़े 790 करोड़ रुपये का कर्ज चुका दिया गया है, ताकि वह ‘बेहतर रणनीति से काम कर सके।’ यह कदम महज वित्तीय सुधार नहीं, बल्कि छवि सुधार का भी प्रयास है। लेकिन जैसे हर आर्थिक सुधार के बाद संस्थागत सुधार की आवश्यकता होती है, वैसे ही हाउसिंग बोर्ड की समस्या सिर्फ कर्ज नहीं थी, उसकी सबसे बड़ी बीमारी क्वालिटी कंट्रोल की कमी, पुराने प्रोजेक्ट्स का चरमराया ढांचा और ग्राहकों की अनसुनी शिकायतें थीं।

राजनीतिक रूप से भी यह विषय संवेदनशील है, क्योंकि आवास सिर्फ ईंट-सीमेंट की बात नहीं, बल्कि जनता की आकांक्षाओं और सरकार पर भरोसे का मुद्दा है। मुख्यमंत्री ने एआई चैट-बॉट और डिजिटल पोर्टल की घोषणा कर आधुनिकता का तडक़ा लगा दिया है, लेकिन जनता का अनुभव कहता है कि बोर्ड की समस्या सिर्फ ‘सूचना’ की नहीं, ‘नियमितता और जि़म्मेदारी’ की है। लोग यह भी जानते हैं कि तकनीक तभी काम करती है जब जमीन पर उसका इस्तेमाल करने वाले तंत्र में सुधार हो।

साय के भाषण में यह बात साफ झलकी कि वे संस्था को बंद करने वाली सोच के बजाय उसे सुधारने की दिशा में खड़ा करना चाहते हैं। यह राजनीतिक रूप से सुरक्षित भी है और प्रशासनिक रूप से तर्कसंगत भी। लेकिन क्या यह सुधार का रास्ता इतना आसान है? क्योंकि उसी जनता ने एक समय बोर्ड के स्लोगन ‘हम मकान नहीं, घर बनाते हैं’ को पलटकर मज़ाक में कहना शुरू कर दिया था—‘घर वही होते हैं जो बाद में टूट जाते हैं।’ यह मज़ाक नहीं, जनता का कटाक्ष था, और कटाक्ष राजनीति में सबसे सटीक फीडबैक माना जाता है।
अब बोर्ड को नई परियोजनाएँ तो मिल गईं, मगर उसकी पुरानी कॉलोनियों की हालत, मेंटेनेंस की विफलता, और निर्माण गुणवत्ता की कमजोर पड़ चुकी प्रक्रियाओं को कैसे सुधारा जाएगा, इस सवाल का जवाब मुख्यमंत्री के भाषण में नहीं था। यही वह जगह है जहाँ सरकार को सख्त और स्पष्ट रोडमैप देने की जरूरत है। कर्ज चुकाना एक पहलू है, मगर पुराने प्रोजेक्ट्स की बीमारी ठीक किए बिना नई परियोजनाएँ शुरू करना वैसा ही है जैसे पुरानी दीवार में दरार रहते हुए नई पुताई कर देना।

साय सरकार के पास मौका है कि वह हाउसिंग बोर्ड को सिर्फ ‘सरकारी फ्लैट देने वाली संस्था’ की सीमित छवि से निकालकर एक भरोसेमंद सार्वजनिक एजेंसी में बदल दे। इसके लिए तीन बातों की जरूरत है क्वालिटी की स्वतंत्र मॉनिटरिंग, पुराने प्रोजेक्ट्स का पुनरुद्धार, और शिकायतों पर तय समय में समाधान। अगर सरकार इन तीनों पर राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाती है, तब ही यह कहा जा सकेगा कि बोर्ड अपनी पुरानी छवि की राख से उठकर नया अध्याय लिख रहा है।

इस संपादकीय की तटस्थ बात यही है कि हाउसिंग बोर्ड को बंद कर देना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि समस्या से भागना है। सच्चा समाधान वही है जो मुख्यमंत्री कहते तो हैं लेकिन अब उन्हें इसे जमीन पर लागू कर दिखाना होगा। अगर वे यह कर पाए, तो छत्तीसगढ़ में आवास सिर्फ चुनावी नारा नहीं रहेगा, बल्कि सच में सामाजिक सुरक्षा का आधार बनेगा। और शायद तब एक दिन लोगों को फिर यह कहने का हक मिलेगा ‘हम मकान नहीं, सचमुच घर बना रहे हैं।’

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