अभी हाल में ही बिलासपुर में हिन्दी से जुड़े एक कार्यक्रम में आमंत्रित कहानीकार /साहि्त्यकार,को अपमानित कर बाहर निकाल देनेसे जुड़ी घटना को लेकर साहित्य जगत और जनमानस उद्धवेलित है।
अतिथि देवो भव कहने और बरतने वाले देश में बुलाये गये अतिथि लेखक के साथ ऐसा असभ्य व्यवहार कुलपति के पद बैठा कोई व्यक्ति नही कर सकता है।ऐसा व्यवहार कोई भी अपने किसी भी अतिथि से नहीं कर सकते। मनोज रूपडा तो एक केवल एक प्रतीक मात्र हैं।कुलपति को यदि अपने ज्ञान का प्रदर्शन करना था,और यदि वे इतने ही धीर गंभीर और योग्य हैं तो वह भी अपने बुलाये मान्य लेखकों के सामने करना चाहिये था ।
यह घटना या कहें दु्र्घटना.. केवल एक व्यक्ति या एक घटना तक सीमित नहीं है, बल्कि वह प्रशासनिक मर्यादा, अकादमिक शिष्टाचार और भाषा-संस्कृति के सम्मान जैसे मूलभूत मूल्यों की याद दिलाती है। एक प्रशासनिक अधिकारी और हिन्दी साहित्य के जानकार के रूप में मैं इसे सकारात्मक चेतावनी और संस्थागत आत्मावलोकन का अवसर मानता हूँ।
विश्वविद्यालय किसी भी समाज की बौद्धिक और नैतिक चेतना का केंद्र होते हैं। कुलपति का पद केवल प्रशासनिक अधिकार का नहीं, बल्कि संयम, विनय और संवादशील नेतृत्व का प्रतीक होता है। अतिथि लेखक के साथ हुआ कथित व्यवहार—जैसा कि सार्वजनिक रूप से सामने आया—यदि सच है, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण अवश्य है, किंतु इसे टकराव नहीं, सुधार की जमीन के रूप में देखा जाना चाहिए। लेख में यह आग्रह कि कुलपति को क्षमा माँगनी चाहिए, दंडात्मक नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा की पुनर्स्थापना का सुझाव है। क्षमा माँगना कमजोरी नहीं, बल्कि नेतृत्व की परिपक्वता का प्रमाण होता है।
भारतीय परंपरा में “अतिथि देवो भव” कोई औपचारिक वाक्य नहीं, बल्कि व्यवहार की कसौटी है। साहित्यकार केवल व्यक्ति नहीं होता; वह भाषा, समाज और संवेदना का प्रतिनिधि होता है। अतः किसी लेखक के साथ संवाद में असंवेदनशीलता, अनजाने में ही सही, भाषा और संस्कृति की प्रतिष्ठा को आहत कर सकती है। इस दृष्टि से लेख का यह कथन अत्यंत सार्थक है कि लेखक का अपमान, उस भाषा के गौरव को चोट पहुँचाता है—विशेषकर तब, जब कार्यक्रम स्वयं हिन्दी के सम्मान के लिए आयोजित हो।
प्रशासनिक अनुभव कहता है कि सत्ता पद से नहीं, व्यवहार से वैधता पाती है। किसी सभा में प्रश्न पूछना, असहमति व्यक्त करना या विषय-वस्तु की ओर ध्यान दिलाना—ये सब लोकतांत्रिक और अकादमिक संवाद के आवश्यक तत्व हैं। इन्हें अहं पर आघात मानकर प्रतिक्रिया देना संस्थागत संस्कृति को कमजोर करता है। इसके विपरीत, संयत प्रतिक्रिया, धन्यवाद और आत्ममंथन—ये संस्थान को ऊँचा उठाते हैं।
यह भी सच है कि आज सार्वजनिक जीवन में सम्मान का अर्थ कई बार दिखावटी अनुमोदन तक सिमट गया है। लेख इस प्रवृत्ति पर सटीक टिप्पणी करता है और याद दिलाता है कि हर व्यक्ति—चाहे वह सत्ता में हो या नहीं—सम्मान का अधिकारी है। यही भावना विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों और आचरण दोनों में झलकनी चाहिए।
हिन्दी के संदर्भ में यह प्रसंग और भी संवेदनशील है। हिन्दी केवल राजभाषा नहीं, जनभाषा, संतों और लोक की भाषा है। उसका सम्मान शब्दों से नहीं, व्यवहार से होता है। यदि कोई चूक हुई है, तो गुरुघासीदास विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के लिए यह अवसर है कि वह संवाद, विनय और मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत करे।
अंततः, इस घटना से केवल चहुंदिश आक्रोश नहीं उपजा बल्कि,एक बडे़ सबक का प्रतीक बन गया है!भविष्य में ऐसा दोबारा न होगा….ऐसी आशा जगी है—आशा कि प्रशासन और साहित्य साथ चलें, अहं नहीं, आत्मालोचन आगे आए, और एक सरल-सी क्षमा संस्था की प्रतिष्ठा को और ऊँचा कर दे। यही सकारात्मकता इस की सबसे बड़ी शक्ति हो सकती है।