
कृति आरके जैन
वैलेंटाइन डे का नाम लेते ही आज मन में गुलाब, चॉकलेट, टेडी और महंगे गिफ्ट्स की चमकदार तस्वीर उभर आती है। प्यार जैसे पवित्र भाव को हमने धीरे-धीरे बाजार की सजावटी वस्तु बना दिया है। ऐसा प्रतीत होता है मानो बिना तोहफों के प्रेम अधूरा और बेकार है। लेकिन क्या सच में प्यार की पहचान इन दिखावटी चीजों से होती है?
पारंपरिक प्रेम की जड़ें त्याग और समर्पण में गहराई से जुड़ी हुई थीं। राम-सीता, राधा-कृष्ण, हीर-रांझा और लैला-मजनूं जैसी प्रेम कथाएं हमें सिखाती हैं कि प्रेम में त्याग सर्वोच्च मूल्य था। प्रेमियों ने समाज, परिवार और यहां तक कि अपने जीवन तक का बलिदान दिया। वैलेंटाइन डे की शुरुआत भी संत वैलेंटाइन के महान त्याग से हुई, जिन्होंने प्रेम की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
मॉडर्न लव की दुनिया में सोशल मीडिया ने प्यार को एक मंच बना दिया है। इंस्टाग्राम और फेसबुक पर महंगे डिनर, लग्जरी ट्रिप और कीमती गिफ्ट्स की तस्वीरें आज प्रेम का प्रमाण मानी जाती हैं। लोग अब कम महसूस करते हैं और ज्यादा दिखाते हैं। पारंपरिक प्रेम में त्याग चुपचाप होता था, बिना किसी प्रचार और प्रदर्शन के जैसे मां का बच्चे के लिए रातभर जागना, पिता का अपनी इच्छाओं को दबाना. पूंजीवाद ने प्यार को व्यापार में बदल दिया है, जहां भावनाएं भी बिकाऊ वस्तु बन गई हैं।

भारतीय संस्कृति में त्याग को सदैव पवित्र और श्रेष्ठ माना गया है। सावित्री, सती-सावित्री, मीरा और सीता जैसे आदर्श चरित्र हमें प्रेम में समर्पण और निष्ठा का सही अर्थ समझाते हैं। यहां प्यार केवल एक भावना नहीं, बल्कि साधना और तपस्या था। लेकिन वैश्वीकरण के प्रभाव से वैलेंटाइन पश्चिमी संस्कृति के साथ भारतीय समाज में प्रवेश कर गया। धीरे-धीरे युवा वर्ग ने इसे अपनाया, पर उसके साथ उपभोगवाद भी फैलता गया। गिफ्ट्स प्रेम का मापदंड बन गए। रिश्ते तेजी से बनते हैं और उतनी ही जल्दी टूट भी जाते हैं। स्थिरता की जगह अब अस्थिरता ने ले ली है।
प्यार की असली भाषा त्याग है, गिफ्ट नहीं। । पारंपरिक प्रेम में त्याग से रिश्ते मजबूत और स्थायी होते थे, जबकि आधुनिक प्रेम में दिखावे से वे कमजोर और अस्थिर होते जा रहे हैं। हमें फिर से छोटे-छोटे त्यागों को अपनाना होगा, समय देना, समझना, साथ निभाना और सम्मान करना। वैलेंटाइन जरूर मनाएं, लेकिन दिल और भावना से। जब प्रेम में त्याग वापस लौटेगा, तभी वह सच्चा, गहरा और अमर बन सकेगा।
बड़वानी (मप्र)