छत्तीसगढ़ सरकार के जनसंपर्क विभाग की पहल पर राज्य की तीस महिला पत्रकारों को गुजरात अध्ययन भ्रमण पर भेजना वुमेन इम्पॉवरमेंट की एक शानदार मिसाल है।
रायपुर से दिल्ली जाने वाली एयर इंडिया की फ्लाइट में आज सुबह-सुबह छत्तीसगढ़ की कई महिला पत्रकारों को, जिन्होंने मेरे साथ काम किया है या जो मुझे जानती हैं, रायपुर के स्वामी विवेकानंद एयरपोर्ट पर उत्साह से लबरेज़ देखकर अच्छा लगा। पूछने पर पता चला कि ये सभी सरकार की पहल पर गुजरात अध्ययन भ्रमण पर जा रही हैं। इनमें कई ऐसी पत्रकार भी शामिल थीं, जो पहली बार विमान यात्रा कर रही थीं।

इनके सहयोग के लिए जनसंपर्क विभाग के दो पुरुष अधिकारी—कमलेश साहू और प्रेमशंकर पटेल—भी साथ थे। इसके अलावा इस प्रेस टूर में शामिल महिला पत्रकारों के नाम इस प्रकार हैं—
1. निशा द्विवेदी
2. करिश्मा सोनी
3. सुप्रिया पांडेय
4. उत्तरा विदानी
5. कोमल धनेसार
6. तनु वर्मा चंद्राकर
7. प्रियंका जायसवाल
8. चित्रा पटेल
9. नेहा श्रीवास्तव
10. दामिनी बंजारे
11. पुष्पा नितिन रोकड़े
12. सरिता ध्रुव
13. विनय त्रिवेदी अवस्थी
14. नीरा साहू
15. मीना
16. निशा मसीह
17. उषा सोनी
18. जिज्ञासा चंद्रा
19. तज़ीन नाज़
20. कमरून निशा
21. नूरजहाँ
22. रचना बंछोर
23. राजश्री गुप्ते
24. शगुफ्ता शिरीन
25. सरिता दुबे
26. मधुमिता शेखर

महिला अधिकारी
- अंजू नायक
- करुणा पांडेय द्विवेदी
- दनेश्वरी संभाकर
- आमना खातून
छत्तीसगढ़ सरकार ने इस बार पहली बार जनसंपर्क विभाग के बजट में प्रेस टूर के नाम पर बजट प्रावधान किया है। हाल ही में राज्य के अलग-अलग जिलों के पत्रकारों का टूर आयोजित किया गया था। ऐसा नहीं है कि इसके पहले प्रेस टूर आयोजित नहीं हुए। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पत्रकारों को गुजरात, आंध्र और कर्नाटक के टूर पर भेजा गया था, जिनका मैं स्वयं हिस्सा रहा हूँ। उसके बाद थाईलैंड, गोवा आदि के टूर भी हुए। विधानसभा पत्रकार दीर्घा समिति के माध्यम से भी पत्रकारों के हर साल टूर आयोजित होते हैं।

यहाँ यह सवाल भी लाज़मी है कि इन अध्ययन टूरों के बाद क्या उनके अनुभवों और रिपोर्टों पर भी कोई अमल होता है?
देशभर में पत्रकारों की प्रताड़ना और उत्पीड़न की खबरों के बीच छत्तीसगढ़ में पत्रकार सुरक्षा कानून, पत्रकार पेंशन योजना, पत्रकारों की बीमारी और उनके आश्रितों के लिए पत्रकार कल्याण योजना लागू है। इसके अलावा राजधानी रायपुर में पत्रकारों को सस्ती दर पर आवास और भूखंड भी दिए गए हैं।
अक्सर यह सवाल भी उठता है कि मीडिया संस्थान अपने कर्मचारियों—पत्रकारों—को क्या देते हैं। बहुत से संस्थान नियुक्ति पत्र तक नहीं देते, लेकिन सरकार से सुविधाएँ लेने के लिए ऐसे-ऐसे नामों की सिफारिश कर देते हैं, जो सीधे पत्रकारिता के पेशे से भी जुड़े नहीं होते। आज सरकारी संस्थानों के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि किसे पत्रकार माना जाए और किसे नहीं। छोटे स्थानों पर पत्रकारों के नाम पर गैर-पत्रकारों की बड़ी जमात शोरगुल के साथ मौजूद रहती है।

प्रसंगवश मुक्तिबोध का यह कवितांश याद आता है—मत पूछो उनसे
क्या है तुम्हारी पॉलिटिक्स!
तटस्थता के
सिंहासन पर भूषित
वे स्वतंत्र पत्रकार हैं!
सत्ता के वफ़ादार हैं!
बड़े अदाकार हैं!
अपराधों के राजदार हैं!
जनतंत्र के गुनहगार हैं!

इस बार रायपुर–बिलासपुर के प्रेस क्लब चुनाव में पत्रकारों के अलग-अलग पैनलों ने किसी राजनीतिक दल की तरह घोषणा-पत्र जारी किए। इनमें प्रमुख रूप से नवा रायपुर में पत्रकारों के आवास को लेकर 30 दिनों के भीतर ठोस पहल, आवास और सुरक्षा को लेकर राज्य सरकार से वार्ता, तथा “कमल विहार आवास योजना” के तहत 309 पत्रकारों को आवास आबंटन के लिए स्वीकृत 8 करोड़ रुपये को ज़मीनी रूप देने जैसे वादे शामिल थे। अच्छी लाइब्रेरी, प्रशिक्षण, भ्रमण, पेंशन जैसी कई घोषणाएँ भी की गईं।
इसी चुनाव में हमारी सहकर्मी निवेदिता साहू—जो आज आज की जनधारा की डिप्टी एडिटर हैं—ने रायपुर प्रेस क्लब का चुनाव जीतकर संयुक्त सचिव का पद हासिल किया है।
महिला पत्रकारों की बात करें तो अभी उनकी उपस्थिति अपेक्षाकृत कम है, ठीक वैसे ही जैसे समाज के अन्य क्षेत्रों में। लेकिन धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ रही है। पंचायती राज अधिनियम के चलते पंचायतों और नगरीय निकायों में महिलाओं की भागीदारी और नेतृत्व मजबूत हुआ है, लेकिन विधानसभा और लोकसभा में यह इंतज़ार अब भी जारी है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण के कारण महिलाओं की संख्या बढ़ी है, पर कई क्षेत्र अभी भी अछूते हैं।
आधी आबादी को पूरा हक़ और पूरे अवसर मिलें—इसके लिए अभी भी कई स्तरों पर संघर्ष जारी है। पुरुष-प्रधान सामाजिक व्यवस्था और मानसिकता के चलते बहुत कुछ किया जाना बाकी है।
लैंगिक समानता की सोच और “म्हारी बेटियाँ बेटे से कम नहीं” के विश्वास के साथ दिल्ली से संचालित एक टीवी चैनल की बागडोर अपनी बड़ी बेटी सुरूचि को सौंपते हुए हमने चैनल में हर स्तर पर महिलाओं को प्राथमिकता दी। जब इसका सम्मेलन हुआ, तो तत्कालीन राज्यपाल और मुख्यमंत्री ने इतनी बड़ी संख्या में महिला पत्रकारों की मौजूदगी देखकर आश्चर्य व्यक्त किया।
अब समाज में धीरे-धीरे ही सही, ‘सरपंच पति’ और ‘पार्षद पति’ जैसी सोच बदल रही है और महिलाएँ स्वयं आगे आकर अपना कामकाज संभाल रही हैं। “लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ” और महिला सशक्तिकरण की सोच के चलते जो स्त्रियाँ कभी दृश्य से अनुपस्थित थीं, वे अब हर क्षेत्र में दिखाई देने लगी हैं।
तीन दशक पहले साक्षरता अभियान के दौरान गूंजने वाली पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक हैं—
देश में गर बेटियाँ मायूस और नाशाद हैं,
दिल पर रखकर हाथ कहिए, मुल्क क्या आज़ाद है?
या—
औरतें उठीं नहीं तो जुर्म बढ़ता जाएगा,
जुर्म करने वाला तानाशाह होता जाएगा।
छत्तीसगढ़ को अक्सर लोग पिछड़ा राज्य समझने की भूल करते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि यहाँ स्त्री–पुरुष आबादी अनुपात देश के बेहतर राज्यों में शामिल है। महिलाओं की श्रमशील भागीदारी भी उल्लेखनीय है। यह अलग बात है कि कुछ स्थानों पर आज भी टोनही जैसी कुप्रथाएँ मौजूद हैं, जिन पर विशेष कानूनों के जरिए कार्रवाई की जाती है।
देश में चल रहे स्त्री विमर्श के बीच छत्तीसगढ़ की महिला पत्रकारों का यह प्रेस अध्ययन टूर एक नई आशा जगाता है। आने वाले समय में ये महिला पत्रकार देश की सीमाओं से बाहर जाकर भी दुनिया के हालातों का अध्ययन करेंगी और अपने लेखन व प्रस्तुतियों के माध्यम से समाज तक पहुँचाएँ
अभी तो वायब्रेंट गुजरात देखना बाक़ी है
सुभाष मिश्र


