बातचीत की मेज पर खड़ी दुनिया: शक्ति प्रदर्शन बनाम स्थायी शांति

-सुभाष मिश्र
दुनिया एक बार फिर ऐसे चौराहे पर खड़ी है, जहां युद्ध और शांति के बीच की दूरी शब्दों, शर्तों और इरादों में सिमट गई है। इस्लामाबाद में प्रस्तावित अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता केवल दो देशों का संवाद नहीं, बल्कि यह वैश्विक संतुलन, कूटनीतिक परिपक्वता और शक्ति-राजनीति की एक निर्णायक परीक्षा बन चुकी है।
एक ओर जेडी वेंस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल है, तो दूसरी ओर मोहम्मद बागेर गालिबाफ और अब्बास अराघची जैसे कड़े रुख वाले नेता मौजूद हैं। लेकिन वार्ता शुरू होने से पहले ही जिस तरह की बयानबाजी सामने आई है, वह इस संवाद की कठिन राह का संकेत देती है।
डोनाल्ड ट्रंप का यह कहना कि ‘ईरान के पास कोई विकल्प नहीं है, केवल एक बयान नहीं, बल्कि वह मानसिकता है जिसमें बातचीत को समाधान नहीं, बल्कि दबाव के औजार के रूप में देखा जाता है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में इस तरह की भाषा पुल बनाने के बजाय दीवारें खड़ी करती है।
दूसरी ओर, तेहरान का स्वर भी उतना ही दृढ़ और प्रतिरोधी है। ईरान का यह स्पष्ट संदेश कि वह अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा, इस बात को रेखांकित करता है कि यह वार्ता किसी एक पक्ष के झुकने से नहीं, बल्कि बराबरी और सम्मान के आधार पर ही आगे बढ़ सकती है। लेकिन यहां सबसे बड़ी कमी है—’विश्वास। वर्षों के आरोप-प्रत्यारोप और समझौतों के टूटने ने दोनों देशों के बीच भरोसे की खाई को बेहद गहरा कर दिया है।
इस पूरे परिदृश्य में पाकिस्तान की भूमिका भी कम दिलचस्प नहीं है। शहबाज शरीफ और असीम मुनीर की सक्रियता यह संकेत देती है कि इस्लामाबाद इस अवसर को अपनी कूटनीतिक प्रासंगिकता बढ़ाने के रूप में देख रहा है। एक ऐसा देश, जिसे अक्सर वैश्विक शक्ति समीकरण में सीमित महत्व दिया जाता है, वह आज एक बड़े संवाद का मंच बनकर उभरा है। लेकिन यह भी सच है कि जब मध्यस्थ खुद रणनीतिक हितों से संचालित हो, तो निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।
इस वार्ता की पृष्ठभूमि केवल कूटनीति नहीं, बल्कि खून-खराबे और अस्थिरता से भरी है। लेबनान में जारी संघर्ष, हजारों जानों का नुकसान और पश्चिम एशिया में बढ़ती अशांति इस बात का संकेत है कि यदि यह वार्ता विफल होती है, तो इसके परिणाम केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक होंगे। खासकर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर बढ़ता तनाव वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी झकझोर सकता है।
सवाल यह नहीं है कि समझौता होगा या नहीं, सवाल यह है कि क्या वह टिकाऊ होगा? क्या यह केवल अस्थायी युद्धविराम तक सीमित रहेगा, या वास्तव में स्थायी शांति की दिशा में कोई ठोस कदम उठेगा?
आज के दौर में ‘शक्ति प्रदर्शन आसान है—सैन्य ताकत, आर्थिक प्रतिबंध और राजनीतिक बयानबाजी के जरिए। लेकिन असली ताकत ‘संयम और ‘संवाद में निहित है। यदि अमेरिका अपनी America First नीति से ऊपर उठकर वैश्विक जिम्मेदारी निभाने की कोशिश करे और ईरान अपने गहरे अविश्वास को कूटनीतिक लचीलेपन में बदल सके, तभी इस वार्ता का कोई सार्थक परिणाम निकल सकता है।
अन्यथा, यह भी उन असंख्य असफल वार्ताओं की सूची में शामिल हो जाएगी, जहां शब्दों की गूंज तो बहुत थी, लेकिन शांति की आवाज कहीं खो गई।
और जहां तक पाकिस्तान का सवाल है तो वह आज भले ही सुर्खियों में हो, लेकिन उसकी असली परीक्षा इस बात में है कि वह इस भूमिका को कितनी निष्पक्षता और गंभीरता से निभा पाता है। एक परमाणु शक्ति होने के बावजूद, उसकी वैश्विक विश्वसनीयता अक्सर सवालों के घेरे में रही है। ऐसे में यह अवसर उसके लिए केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि छवि सुधार का भी है।
अंतत:, इस्लामाबाद की यह वार्ता केवल एक बैठक नहीं, यह एक संकेत है। यह तय करेगी कि आने वाले समय में दुनिया संवाद के रास्ते पर आगे बढ़ेगी या टकराव के अंधेरे में और गहराई तक उतर जाएगी।

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