रायपुर। छत्तीसगढ़ में भूमि डायवर्सन (भू-उपयोग परिवर्तन) की प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने के उद्देश्य से शुरू की गई ऑनलाइन व्यवस्था जमीनी स्तर पर अटकती नजर आ रही है। ‘ऑटो डायवर्सन’ की सुविधा लागू होने के बावजूद बड़ी संख्या में आवेदनों का समय पर निराकरण नहीं हो पा रहा है, जिससे लोगों को एसडीएम कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
राज्य में अब तक कुल 457 आवेदन दर्ज हुए हैं, जिनमें से मात्र 16 मामलों में ही डायवर्सन के आदेश जारी हो सके हैं। राजधानी रायपुर की बात करें तो यहां लगभग 65 आवेदन प्राप्त हुए हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ 4–5 मामलों में ही प्रक्रिया पूरी हो पाई है। बाकी आवेदन तकनीकी कारणों और डेटा की कमी के चलते लंबित हैं।
16 दिन में ऑटो-अप्रूवल का प्रावधान, लेकिन अमल कमजोर
नई व्यवस्था के तहत यदि किसी आवेदन पर 15 दिनों के भीतर सक्षम अधिकारी (एसडीएम) निर्णय नहीं लेते हैं, तो 16वें दिन स्वतः (ऑटो) डायवर्सन की मंजूरी मिल जानी चाहिए। इसके लिए विशेष ‘ऑटो डायवर्सन पोर्टल’ भी शुरू किया गया है, जहां आवेदन से लेकर आदेश तक की पूरी प्रक्रिया ऑनलाइन तय की गई है।
हालांकि, तकनीकी और प्रशासनिक कारणों से यह व्यवस्था अपेक्षित रूप से काम नहीं कर पा रही है।


एनजीडीआरएस में अधूरी एंट्री बड़ी बाधा
समस्या की एक बड़ी वजह यह है कि प्रदेश के 11,087 गांवों की गाइडलाइन दरें अभी तक NGDRS (नेशनल जेनरिक डॉक्यूमेंट रजिस्ट्रेशन सिस्टम) में पूरी तरह दर्ज नहीं हो पाई हैं।
जब तक इन दरों की एंट्री नहीं होती, तब तक न तो आवेदन प्रक्रिया पूरी हो पा रही है और न ही डायवर्सन आदेश जारी किए जा सकते हैं।
राजस्व विभाग के अनुसार, प्रदेश में करीब 20 हजार गांव हैं, जिनमें से लगभग आधे गांवों की जानकारी ही सिस्टम में अपडेट हो पाई है। शेष गांवों में डेटा एंट्री लंबित होने के कारण ऑनलाइन व्यवस्था अधूरी बनी हुई है। रायपुर जिले के कई ग्रामीण क्षेत्रों में भी यही समस्या सामने आ रही है, जहां गाइडलाइन दरों की एंट्री अधूरी है।



रायगढ़ में सबसे ज्यादा आवेदन
जिलों की बात करें तो रायगढ़ में सबसे अधिक 183 आवेदन प्राप्त हुए हैं, लेकिन यहां भी सीमित संख्या में ही प्रकरणों का निराकरण हो सका है। कई आवेदनों में तकनीकी अड़चनें और डेटा की कमी के कारण प्रक्रिया अटकी हुई है।
नागरिकों को हो रही परेशानी
ऑनलाइन व्यवस्था के बावजूद आवेदकों को बार-बार एसडीएम कार्यालय जाना पड़ रहा है। रायपुर में भी आवेदकों का कहना है कि आवेदन की स्थिति स्पष्ट नहीं होती और समय सीमा में आदेश नहीं मिलते। इससे लोगों में असंतोष बढ़ रहा है।
जनता का पैसा लूट रहे सरकारी तंत्र
वहीं इस मामले में विभाग के पूर्व अधिकारी से जब हमने बात की तो उन्होंने बताया की ऑटो डायवर्सन की प्रक्रिया शुरू जरूर कर दी गई है लेकिन इससे लोगों की मुश्किलें कम होने के बजाय और अधिक बढ़ गई है। इसका सीधा कारण है ‘भुइयां’ पोर्टल और व्हाट्सएप चैटबॉट में गाइडलाइन दरों की एंट्री पूरी तरह से अपलोड ही नहीं की गई है जिससे लोगों को परेशानी का सामना करना पढ़ रहा है और इसका सीधा फायदा बिचौलिए उठा रहे है जो जनता से रिश्वत लेकर अधिकारीयों से सांठ गांठ करके जम के मलाई खा रहे है। कुछ मामलों में तो ये भी देखने मिला है की खुद पटवारी और बाबू ही प्रशासनिक चूक का फायदा उठा कर जनता को लूटने का काम कर रहे है।


सरकार के प्रयास और जमीनी हकीकत
राज्य सरकार ने भू-राजस्व प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए ‘भुइयां’ पोर्टल और व्हाट्सएप चैटबॉट जैसी सुविधाएं भी शुरू की हैं, ताकि नागरिक आवेदन की स्थिति ट्रैक कर सकें। इसके साथ ही प्रति वर्ग मीटर 3 से 25 रुपये तक की नई दरें भी निर्धारित की गई हैं।
इसके बावजूद, सिस्टम में अधूरी जानकारी और धीमी प्रशासनिक प्रक्रिया के कारण ‘ऑटो डायवर्सन’ का लाभ आम लोगों तक पूरी तरह नहीं पहुंच पा रहा है।
नीति और तकनीक दोनों मौजूद हैं, लेकिन क्रियान्वयन की कमजोरी के चलते यह व्यवस्था फिलहाल अपने उद्देश्य को पूरा करती नजर नहीं आ रही है।