भारत का संविधान महिलाओं के सशक्तिकरण, सुरक्षा और देखभाल के लिए एक सुदृढ़ ढांचा प्रदान करता है. विश्व मंच पर विभिन्न समझोंतों और सिफारिशों के अनुपालन में देश की सरकारों ने कई ऐसे क़ानूनो और कार्यक्रमों को लागू किया जो महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक क्षेत्रों में उनकी गरिमा, सुरक्षा और अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
इसी क्रम में महिलाओं और लड़कियों/बालिकाओं के लिए संचालित योजनाओं एवं कार्यक्रमों पर होने वाले व्यय को स्पष्ट, पारदर्शी और एक निश्चित माप के साथ प्रस्तुत करने के उद्येश्य से वित्तीय वर्ष 2005-06 मे तत्कालीन भारत सरकार ने “जेंडर बजटिंग” की अवधारणा को लागू किया। यह एक ऐसा तरीका था जिसमें सरकार और आम जनता यह देख सकती थी कि बजट में रखे गए कुल पैसे का कितना हिस्सा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से महिलाओं और लड़कियों के लिए है, और यह भी कि वह हिस्सा उनकी ज़रूरतों और समानता के लक्ष्य को पूरा कर रहा है अथवा नहीं; अर्थात यह सुनिश्चित करना कि बुनियादी सेवाओं और योजनाओं में लिंग के दृष्टिकोण से संसाधन आवंटित किया जा रहा है अथवा नहीं. जेंडर बजटिंग महिलाओं और लड़कियों के लिए विशेष जरूरतों को पहचानने की सरकार की चिंता को भी दर्शाता है तथा योजनाओं कोऔरअधिक संवेदनशील बनाता है.

पिछले वित्तीय वर्षों के जेंडर बजटिंग के आकड़ों का अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि वित्तीय वर्ष 2015-16 से वित्तीय वर्ष 2026-27 के बीच सरकार ने जेंडर बजट मे औसतन 4 से 5 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि का लक्ष्य रखा परंतु वास्तविक आवंटन संशोधित बजट के आधार पर कुल लक्षित बजट से बहुत कम रहा. वित्तीय वर्ष 2024-25 और 2025-26 मे जेंडर बजटिंग का अनुमानित लक्ष्य क्रमशः3.76 लाख करोड़ और 4.49 लाख करोड़ था जबकि उक्त लिखित अनुमानित लक्ष्य के स्थान पर कुल संशोधित बजट क्रमशः359722.23 करोड़ और 397884.98 करोड़ ही रहा. वर्तमान वित्तीय वर्ष 2026-27 मे जेंडर बजटिंग के लिए लगभग 5 लाख करोड़ की अनुमानित राशि, जो कुल वित्तीय बजट का 9.37% है, के लिए अब देखना यह है कि पुनः संशोधित (revised) बजट के बाद कुल वास्तविक आवंटन कितना होगा और महिलाओं को कहाँ तक उस आवंटन का लाभ मिल सकेगा?
गौरतलब बात यह है वित्तीय वर्ष 2015-16 से 2025-26 के बीच जेंडर बजट की वार्षिक वृद्धि की अपेक्षा महिला-उन्मुख योजनाओं में औसत वास्तविक व्यय दर में 0.96% से 0.5% तक की गिरावट दर्ज की गई है. अतः यह कहा जा सकता है कि उपलब्ध संसाधन के बावजूद योजनाओं का क्रियान्वयन, समन्वय तथा प्राप्त आवंटन का जमीनी स्तर तक शोधन की व्यवस्थागत चुनौतियों पर काम किए जाने को प्राथमिकता दिया जाना समय की मांग है अन्यथा बजट प्रस्तुतीकरण के दौरान सरकार द्वारा ली जा रही वाहवाही योजनाओं के समुचित क्रियान्वयन की गारंटी नहीं देतीं. वास्तव में जेंडर बजट मे आवंटन की वृद्धि को सफल तभी माना जा सकता है जब लक्षित बजट सोच समझ कर सभी पहलुओं का समुचित आकलन करने के बाद तय हो और तदनुसार उसका आवंटन तथा कुल आवंटन का सम्पूर्ण उपयोग समयानुसार सुनिश्चित किया जाये. यदि ऐसा होता है तभी जेंडर बजटिंग का असर सामाजिक संकेतकों जैसे महिलाओं की सुरक्षा, स्वास्थ्य स्थिति, पोषण स्तर, रोजगार और शिक्षा में वृद्धि तथा घरेलू-सामाजिक सुरक्षा के मानकों में सुधार आदि पर दिखाई पड़ेगा. इस हेतु कार्यक्रमों के वास्तविक क्रियान्वयन और परिणाम-आधारित निगरानी की आवश्यकता अभी भी मजबूती से जमीनी स्तर पर होनी चाहिए ताकि लिंग समानता एवं महिला सशक्तिकरण के वास्तविक लक्ष्य पूरे हो.