श्याम यादव
कांग्रेस की राजनीति में राज्यसभा अब प्रतिनिधित्व का प्रश्न नहीं रही, वह प्रबंधन का साधन बन चुकी है। यह वह सदन है, जहां नेता जनता के फैसले से नहीं, पार्टी की सुविधा से पहुंचते हैं। ऐसे समय में जब दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ नेता राज्यसभा से इनकार करते हैं, तो वह व्यक्तिगत असहमति से ज़्यादा कांग्रेस की मौजूदा राजनीतिक कार्यशैली पर टिप्पणी बन जाती है।
कांग्रेस आज जिन संकटों से गुजर रही है, वे केवल चुनावी नहीं हैं। संकट नेतृत्व का है, भूमिका का है और सबसे ज़्यादा भरोसे का है। पार्टी के भीतर निर्णय की प्रक्रिया लगातार सिमटती जा रही है। जिन नेताओं को खुली राजनीतिक जिम्मेदारी देना जोखिम भरा लगता है, उन्हें राज्यसभा के रास्ते सम्मानित कर देना एक आसान समाधान बन गया है। यह समाधान पार्टी के लिए सुविधाजनक हो सकता है, लेकिन राजनीति के लिए खोखला।
राज्यसभा का इस्तेमाल अब वैचारिक हस्तक्षेप के मंच की तरह नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण पार्किंग की तरह किया जाने लगा है। यहां नेता सक्रिय राजनीति से दूर रहते हुए भी राजनीतिक उपस्थिति बनाए रखते हैं। न उन्हें संगठन में जवाबदेही निभानी होती है, न जनता के सामने खड़ा होना पड़ता है। कांग्रेस की यह प्रवृत्ति बताती है कि पार्टी संघर्ष से ज़्यादा संतुलन साधने में विश्वास करने लगी है।
दिग्विजय सिंह का इनकार इसी संतुलन को बिगाड़ता है। यह कांग्रेस के भीतर उस धारणा को चुनौती देता है कि हर वरिष्ठ नेता के लिए अंतिम ठिकाना राज्यसभा ही है। यह सवाल उठता है कि क्या पार्टी अब यह मान चुकी है कि अनुभव का इस्तेमाल मैदान में नहीं, केवल संसद की औपचारिकता में किया जाएगा?
कांग्रेस की राजनीति लंबे समय से दो धाराओं में बंटी दिखती है—एक वह, जो सत्ता के करीब रहकर राजनीति को सुरक्षित रखना चाहती है; दूसरी वह, जो टकराव, असहमति और जोखिम को राजनीति का अनिवार्य हिस्सा मानती है। राज्यसभा पहली धारा का औज़ार बन चुकी है। दिग्विजय सिंह जैसे नेता, जो इससे दूरी बनाते हैं, दूसरी धारा की याद दिलाते हैं, भले ही वह धारा अब कमजोर क्यों न हो।
यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस में राज्यसभा का चयन अक्सर राजनीतिक संदेश देने के बजाय राजनीतिक असुविधा छुपाने का तरीका बन जाता है। किसे आगे लाना है, किसे सीमित करना है, और किसे सम्मान के साथ किनारे करना है—इन सबका समाधान नामांकन में खोज लिया जाता है। इससे पार्टी की वैचारिक बहस और संगठनात्मक ऊर्जा दोनों ही प्रभावित होती हैं।
कांग्रेस आज जिस दौर में है, वहां उसे नेताओं की चुप्पी से ज़्यादा उनके सवालों की ज़रूरत है। लेकिन राज्यसभा की राजनीति सवालों को संसद के शिष्टाचार में बांध देती है। वहां असहमति भी मर्यादित होती है और आलोचना भी नियंत्रित। यही कारण है कि यह मंच सत्ता के लिए सुरक्षित है, लेकिन बदलाव के लिए नहीं।
दिग्विजय सिंह का फैसला इसलिए भी असहज करता है क्योंकि वह कांग्रेस को उसकी आदतों से बाहर निकलने को मजबूर करता है। यह बताता है कि हर नेता इस व्यवस्था को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है। राजनीति में कभी-कभी इनकार वह भूमिका निभा देता है, जो कई भाषण नहीं कर पाते।
अंततः यह प्रश्न दिग्विजय सिंह का नहीं, कांग्रेस का है। क्या पार्टी राज्यसभा को वैचारिक लड़ाई का मंच बनाएगी या उसे सुविधाजनक चुप्पी का सदन बनाए रखेगी? क्या कांग्रेस जोखिम उठाने वाली राजनीति को फिर से अपनाएगी, या प्रबंधकीय राजनीति में ही सिमट जाएगी?
इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन इतना तय है कि जब कोई नेता सत्ता की आसान राह से मुड़ता है, तो वह पार्टी को अपने रास्ते पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर करता है। और आज की कांग्रेस के लिए यही सबसे ज़रूरी हस्तक्षेप है।