
“शब्द”
शब्द
दुःख, कातरता, करूणा, दया, मया, प्रेम
प्याज के छिलकों की तरह
परत-दर-परत उतरते जाते हैं
दुःख की निविड गहराइयों में
पा जाते हैं अभिव्यक्ति
जैसे पा जाते हैं पुरातत्ववेत्ता
धरा की अतल गहराइयों में
सभ्यता के बिछड़े सूत्र
जैसे पेड़ की जड़ें उतर पा जाती हैं अमृत रस
जैसे रंग पा जाते हैं अभिव्यक्ति कैनवास पर
होते हैं जख्मी शब्द
और कभी लहुलूहान
शर्माते और लजाते हैं कभी
और कभी होते हैं परेशान
होता है कमी छलनी सीना
ए. के. 47 से निकलने वाली गोलियों-सा
जब करते हैं हम इस्तेमाल शब्द
चाटुकारिता, झूठ और फरेब के लिए
घिघियाते हैं शब्द
मरते हैं ये मौत
उसी तरह
जिस तरह मरती है सभ्यता
अचानक चले आए जलजले-से
प्यार का एक खूबसूरत फूल
मरता है जैसे खिलने से पहले ।
शब्द
जिंदगी की धड़कन हैं
पेट में पल रहे बच्चे की हंसी है शब्द
इस हंसी को बचाया जाना चाहिए अक्षत
शब्दों की पवित्रता को बचाया जाना चाहिए
की जानी चाहिए कोशिश
एक ज़रूरी काम की तरह
बचाया जाना चाहिए
जैसे बचाते हैं हम अपना जीवन
हर कीमत पर । रायपुर, छत्तीसगढ़