
सच
वो
सच था
जिसे मैं
कह रही थी
लेकिन
लोग ज़ोर-ज़ोर से चीख कर कह रहे थे
ये
झूठ है, झूठ है, झूठ है।
मेरी अकेली आवाज़
भीड़ की चीख के आगे
दब सी गयी
लोगों की तेज़ आवाज़ में
कहे गए शब्द
झूठ है, झूठ है, झूठ है
गूंजते रहे चहुँ ओर।
मेरा सच
छोटा पड़
गुम हो गया।
मैं
फिर भी
बुलंद आवाज़ में
कहती रही
ये सच है, सच है, सच है।
बाजार
बाज़ार अब घर तक
आ गया है
उंगलियों की पोरों पर
टिकी है खरीददारी
कहाँ तक और
कितना बचोगे
यह समय
बेचने और खरीदने का है
हर जिन्स
बिक रही है
ईश्वर से लेकर
आदमी तक ।