कविता

सरिता सिंह

मौन रह कर भी मुखर हूँ मैं

जैसे

पानी के भीतर जलजला

आग के भीतर उसकी धधक

हवा के भीतर उसकी लय

और मिट्टी के भीतर उसका

गीलापन

साथ लिए

हरियाने पृथ्वी को

वर्षों वर्षों से

हाँ मैं एक स्त्री हूँ

हाँ मैं सहस्त्र स्त्री हूँ।

जगदलपुर

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