छत्तीसगढ़ में अपनों के जुल्म से सहमीं महिलाएं और बुजुर्ग, चौंका रहे हैं ये सरकारी आंकड़े

रायपुर: छत्तीसगढ़ में रिश्तों को शर्मसार करने वाली एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है। जिस घर को सबसे सुरक्षित ठिकाना माना जाता है, वहीं पर महिलाएं और बुजुर्ग सबसे ज्यादा मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना झेल रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) की ताजा रिपोर्ट ने प्रदेश में पारिवारिक सुरक्षा के दावों की पोल खोल दी है। आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में महिलाओं पर क्रूरता के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने ही घरों में अपनों की बेरुखी और हिंसा के शिकार हो रहे बुजुर्गों का ग्राफ भी तेजी से ऊपर जा रहा है।

इस सरकारी रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ घरेलू प्रताड़ना के 8 हजार से अधिक केस दर्ज हुए हैं। इसके साथ ही, अब घर के अंदर ही नहीं बल्कि इंटरनेट की आभासी दुनिया (डिजिटल प्लेटफॉर्म) में भी महिलाओं को निशाना बनाया जा रहा है।

8601 केस दर्ज: क्या घरेलू मोर्चे पर हार रही है कानून व्यवस्था?

आंकड़ों का विश्लेषण करें तो वर्ष 2024 के दौरान छत्तीसगढ़ के अलग-अलग जिलों में महिलाओं के खिलाफ अपराध के कुल 8,601 मामले थानों तक पहुंचे। यह संख्या इसलिए डराती है क्योंकि साल 2023 में यह आंकड़ा 8,035 था, जो अब और बढ़ गया है। इन मामलों में शारीरिक मारपीट के अलावा दहेज के लिए तंग करना, गाली-गलौज और मानसिक रूप से प्रताड़ित करना शामिल है। सामाजिक जानकारों का कहना है कि इसके पीछे अत्यधिक शराबखोरी, पारिवारिक कलह, आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव जैसे बड़े कारण काम कर रहे हैं।

चारदीवारी के बाद अब ‘डिजिटल’ दुनिया में भी सुरक्षित नहीं महिलाएं

अपराधियों के हौसले इतने बुलंद हैं कि अब महिलाएं सोशल मीडिया पर भी सुरक्षित नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक साल में महिलाओं के साथ ऑनलाइन उत्पीड़न और ब्लैकमेलिंग के 359 साइबर अपराध दर्ज किए गए हैं। फर्जी आईडी बनाकर बदनाम करना, अश्लील संदेश भेजना और ब्लैकमेल करके पैसे वसूलने (एक्सटॉर्शन) जैसी घटनाओं ने पुलिस के साइबर सेल की चिंता बढ़ा दी है।

लोक-लाज और मजबूरी का फायदा उठा रहे आरोपी

महिला अधिकारों के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं का कहना है कि दर्ज आंकड़े तो सिर्फ एक बानगी हैं। असल में जमीनी हकीकत इससे कहीं ज्यादा डरावनी है। बहुत सी महिलाएं सिर्फ इसलिए पुलिस के पास नहीं जातीं क्योंकि उन्हें डर होता है कि समाज क्या कहेगा, या फिर वे आर्थिक रूप से अपने पति या परिवार पर निर्भर होती हैं। शारीरिक चोटों से अलग, महिलाओं को हर दिन अपमानित करना और उनके खर्चों पर पाबंदी लगाना भी घरेलू हिंसा का एक खामोश रूप ले चुका है।

अपने ही आशियाने में बेगाने हुए बुजुर्ग, 92.8% का क्राइम रेट बेहद डरावना

समाज के लिए सबसे शर्मनाक स्थिति बुजुर्गों को लेकर सामने आई है। छत्तीसगढ़ में बुजुर्गों के खिलाफ अपराध का जो दर (क्राइम रेट) है, वह 92.8 फीसदी तक पहुंच गया है। सालभर में सीनियर सिटीजंस के साथ प्रताड़ना और मारपीट के 1,859 मामले सामने आए हैं। अधिकतर मामलों में देखा गया है कि जमीन-जायदाद के विवाद या सिर्फ एक बोझ समझकर बच्चों द्वारा अपने ही माता-पिता को प्रताड़ित किया जा रहा है या उन्हें अकेला छोड़ दिया गया है।

थानों में नहीं है कोई सुनने वाला, उठ रही अलग हेल्प डेस्क की मांग

बुजुर्गों की इस लाचारी के बीच एक बड़ी कमी यह सामने आई है कि राजधानी रायपुर समेत राज्य के ज्यादातर थानों में वरिष्ठ नागरिकों के लिए कोई अलग से हेल्प डेस्क या सहायता केंद्र नहीं है। ऐसे में कई बुजुर्ग शारीरिक कमजोरी या डर के कारण थानों के चक्कर नहीं काट पाते और चुपचाप जुल्म सहते रहते हैं। सामाजिक संगठनों ने सरकार से मांग की है कि बुजुर्गों के लिए हर थाने में एक संवेदनशील और अलग विंग बनाई जाए।

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