:गणेश कछवाहा:
:चिंतक,लेखक:
मानवाधिकार वे अधिकार हैं जो हमें सिर्फ़ इसलिए प्राप्त हैं क्योंकि हम मनुष्य हैं – ये किसी राज्य द्वारा प्रदान नहीं किए जाते । ये सार्वभौमिक अधिकार हम सभी में निहित हैं, चाहे हमारी राष्ट्रीयता, लिंग, राष्ट्रीय या जातीय मूल, रंग, धर्म, भाषा या कोई अन्य स्थिति कुछ भी हो।
वर्ष 2025; 75वीं वर्षगांठ है।इस वर्ष का मुख्य उद्देश्य या नारा दिया गया है – : “सभी मनुष्य स्वतंत्र पैदा होते हैं और सम्मान और अधिकारों में समान होते हैं। विश्व भर में सभी लोगों के जीवन, स्वतंत्रता, समानता और सम्मान से संबंधित मानवाधिकारों को बढ़ावा देना और उनकी रक्षा करना।”
हर साल 10 दिसंबर का दिन पूरे विश्व में विश्व मानवाधिकार दिवस (World Human Rights Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 10 दिसंबर वर्ष 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा (Universal Declaration of Human Rights – UDHR) को अपनाने की ऐतिहासिक तिथि को रेखांकित करता है। यह घोषणापत्र इतिहास में एक मील का पत्थर है, जिसने पहली बार दुनिया भर में सभी मनुष्यों के मौलिक अधिकारों को स्थापित किया।जो हर व्यक्ति के बुनियादी अधिकारों—जैसे जीवन का अधिकार, स्वतंत्रता का अधिकार, समानता का अधिकार, और उत्पीड़न से मुक्ति का अधिकार—की गारंटी देते हैं। द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका के बाद, यह घोषणापत्र इस मूलभूत सिद्धांत पर आधारित था कि सभी मनुष्य गरिमा और अधिकारों में स्वतंत्र और समान पैदा हुए हैं, और यह वैश्विक शांति और प्रगति की आधारशिला बना।

मानवाधिकार दिवस का महत्व और प्रासंगिकता-
मानवाधिकार दिवस मनाना केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए न्याय, सम्मान और सपेमान अवसर सुनिश्चित करने की एक वैश्विक प्रतिबद्धता है।वैश्विक स्तर पर लोगों में मानव अधिकार के प्रति जागरूकता व चेतना का विकास हुआ ।सरकार,जनता,सामाजिक संगठनों एव सिविल सोसायटी में जवाबदारी ,जिम्मेदारी कर्तव्य ,उत्तरदायित्व और जवाबदेही का बोध और दायित्व बढ़ा है।यह दिन हमें याद दिलाता है कि दुनिया के कई हिस्सों में आज भी लाखों करोड़ों लोग गरीबी, अभाव,भेदभाव, युद्ध और तानाशाही के कारण अपने मौलिक अधिकारों से वंचित हैं। यह सरकारों, सामाजिक संगठनों और आम नागरिकों को उनके कर्तव्यों का स्मरण कराता है कि वे इन अधिकारों की रक्षा और प्रचार करें। यह घोषणापत्र राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों को भी शामिल करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और काम का अधिकार भी मानव गरिमा के लिए उतना ही आवश्यक है जितना कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।

वर्तमान चुनौतियाँ-
मानव अधिकार को लेकर दुनिया के विभिन्न हिस्सों में कई महत्वपूर्ण कार्य हुए हैं और हो रहे हैं ।परंतु अब चुनौतियां भी बढ़ रही है।आज की दुनिया में, मानवाधिकारों के सामने कई नई और पुरानी राजनैतिक,सामाजिक,आर्थिक तथा सांस्कृतिक चुनौतियाँ मौजूद हैं।जहाँ भुखमरी,ग़रीबी,अशिक्षा,आर्थिक विषमता,भेदभाव,सांप्रदायिकता,धार्मिक द्वंद्वात्मकता,सामाजिक न्याय,समानता और स्वंत्रता,शरणार्थी संकट और संघर्षरत क्षेत्रों में मानव अधिकारों का हनन एक गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है।वहीं मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर प्रश्न चिह्न अंकित करना उन्हें ही अपराधी घोषित करना एक बहुत बड़ा संकट और चिंता का विषय है।जलवायु परिवर्तन, महामारी, डिजिटल निगरानी और ऑनलाइन नफरत भरे भाषण जैसे मुद्दे मानवाधिकारों की नई सीमाओं और चिंताओं तथा चुनौतियों को परिभाषित कर रहे हैं।
विश्व मानवाधिकार दिवस हमें इन चुनौतियों पर सामूहिक रूप से विचार करने और ठोस कार्रवाई करने के लिए प्रेरित करता है। संयुक्त राष्ट्र हर साल इस दिवस के लिए एक विशेष थीम निर्धारित करता है।जो समकालीन वैश्विक समस्याओं पर केंद्रित होती है।इस वर्ष का थीम है -:विश्व भर में सभी लोगों के जीवन जीने , स्वतंत्रता, समानता और सम्मान से संबंधित मानवाधिकारों को बढ़ावा देना और उनकी रक्षा करना।”
इस दिन का मुख्य उद्देश्य लोगों को जागरूक करना, सक्रिय रूप से मानवाधिकारों की वकालत करने के लिए प्रेरित करना और एक ऐसी दुनिया का निर्माण करना है जहाँ हर व्यक्ति भय और अभाव के बिना अपना जीवन जी सके। यह हमें अपने अधिकारों का उपयोग करने के साथ-साथ दूसरों के अधिकारों का सम्मान करने की जिम्मेदारी भी सिखाता है।
हमारी ज़िम्मेदारियाँ –
मानवाधिकारों का महत्व केवल हमारे अपने अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि 2025 में हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी यह है कि हम हर व्यक्ति की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता का सम्मान करें। हमें किसी भी प्रकार के भेदभाव से दूर रहते हुए न्याय, शांति और सहिष्णुता को बढ़ावा देना चाहिए। समाज में अन्याय, हिंसा या उत्पीड़न दिखाई दे तो चुप रहने के बजाय सही पक्ष का समर्थन करना आवश्यक है। डिजिटल युग में हमारी जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है कि हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उपयोग सोच-समझकर करें, फेक न्यूज़ या नफरत फैलाने वाली सामग्री से बचें और दूसरों की निजता का सम्मान करें। महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा करना, पर्यावरण की सुरक्षा करना तथा जरूरतमंदों की मदद करना भी मानवाधिकारों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। अंततः, मानवाधिकार तभी सुरक्षित रहते हैं जब हम अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाते हुए समाज को अधिक संवेदनशील, सुरक्षित और समान बनाने में सक्रिय योगदान दें।