ज्ञानरंजन का जाना सिर्फ़ एक लेखक का जाना नहीं है; यह उस बेचैन, सवाल करती, असुविधाजनक साहित्यिक चेतना का विराम है, जिसने हिंदी गद्य को सजाया नहीं—झकझोरा। वे उन लेखकों में नहीं थे जिनकी अनुपस्थिति पर केवल श्रद्धांजलि लिख दी जाए; वे ऐसे थे जिनके जाने के बाद भी उनके वाक्य हमें असहज करते रहते हैं, हमारे समय से सवाल पूछते रहते हैं।
मैं उन्हें केवल एक कथाकार, आलोचक या स्तंभकार के रूप में नहीं देखता। ज्ञानरंजन दरअसल एक मिज़ाज थे—हिंदी में दुर्लभ होता जा रहा मिज़ाज। ऐसा मिज़ाज जो सत्ता से डरता नहीं, विचारधाराओं का भक्त नहीं बनता, और साहित्य को किसी नैतिक उपदेश-पुस्तिका में बदलने से साफ़ इनकार करता है।
कथा में असुविधा का सौंदर्य
ज्ञानरंजन की कहानियाँ सहज नहीं थीं—और यही उनकी सबसे बड़ी ताक़त थी। वे पाठक को आराम नहीं देते थे। उनकी कथा-भूमि में प्रवेश करते ही एक अजीब-सी बेचैनी घेर लेती है। पात्र बहुत बड़े नायक नहीं होते, न ही खलनायक। वे आम आदमी होते हैं—लेकिन अपने समय की क्रूरता, समझौतों और नैतिक दिवालियापन के साथ।
उनकी कहानियों में नाटकीयता नहीं, बल्कि धीमी चोट है। एक ऐसी चोट जो पढ़ते समय महसूस नहीं होती, लेकिन बाद में भीतर कहीं रिसती रहती है। यही वजह है कि ज्ञानरंजन को पढ़कर ताली नहीं बजती, बल्कि चुप्पी छा जाती है।
आलोचना: समझौते से इंकार
ज्ञानरंजन की आलोचना सबसे अधिक असुविधाजनक थी—और शायद इसी कारण सबसे ज़रूरी भी। वे किसी खेमे के आलोचक नहीं थे। न प्रगतिशीलता की लाठी लेकर चलते थे, न ही शुद्धतावादी नैतिकता का झंडा उठाते थे। वे साहित्य को उसके भीतर से परखते थे—उसकी भाषा, उसकी ईमानदारी, उसके छल से।
उन्होंने बार-बार यह सवाल उठाया कि क्या हम सचमुच अपने समय को लिख रहे हैं या केवल सुरक्षित वाक्य रच रहे हैं? उनकी आलोचना में भाषा भी आलोचनात्मक होती थी—कहीं-कहीं कटु, कहीं व्यंग्यपूर्ण, और कई बार निर्मम। लेकिन यह निर्ममता व्यक्तिगत नहीं थी; यह साहित्य के प्रति एक गहरी जिम्मेदारी से पैदा हुई थी।
स्तंभकार: विचार का निर्भीक नागरिक
ज्ञानरंजन के स्तंभों को पढ़ते हुए यह स्पष्ट हो जाता है कि वे ‘मत’ नहीं देते थे, वे सोचने की जगह बनाते थे। आज जब स्तंभकारिता अक्सर तात्कालिक प्रतिक्रिया, वैचारिक शोर या सत्ता-समीकरण का विस्तार बन गई है, ज्ञानरंजन का लेखन एक अलग ही नैतिक ऊँचाई पर खड़ा दिखता है।
वे सरल समाधान नहीं देते थे। वे प्रश्न देते थे—और कई बार ऐसे प्रश्न जिनके उत्तर हमारे पास नहीं होते। शायद इसी कारण उनका लेखन लोकप्रियता की दौड़ में आगे नहीं था, लेकिन जो भी उन्हें गंभीरता से पढ़ता था, वह उन्हें भूल नहीं सकता था।
भाषा: सजावट नहीं, सच्चाई
ज्ञानरंजन की भाषा में कोई बनावटी चमक नहीं थी। वह न तो लोकलुभावन थी, न अकादमिक बोझ से दबी हुई। वह भाषा थी जो अपने विचार के साथ ईमानदार थी। कई बार रूखी, कई बार सीधी, और कई बार असहज रूप से सटीक।
वे जानते थे कि भाषा का सबसे बड़ा अपराध झूठ बोलना है—और उन्होंने उस अपराध से जीवन भर दूरी बनाए रखी।
उनका जाना क्या है?
ज्ञानरंजन का जाना एक चेतावनी है। यह संकेत है कि हिंदी में वह पीढ़ी विदा हो रही है जिसने साहित्य को करियर नहीं, जोखिम माना। जो सत्ता से निकटता को उपलब्धि नहीं समझती थी। जो यह मानती थी कि लेखक का पहला दायित्व अपने समय के प्रति है—अपने पाठक के प्रति नहीं।
उनके जाने के बाद सवाल यह नहीं है कि हम उन्हें कितनी श्रद्धांजलियाँ देते हैं। असली सवाल यह है कि क्या हम वह असुविधा सहने को तैयार हैं जो ज्ञानरंजन का लेखन हमसे माँगता था?
अगर नहीं—तो उनका जाना सचमुच बहुत भारी है।
अगर हाँ—तो शायद वे अब भी हमारे बीच हैं।
सादर श्रद्धान्जलि।