Editor-in-Chief सुभाष मिश्र की कलम से – मुझे वर्चुअल लड्डू नहीं चाहिए

-सुभाष मिश्र

मकर संक्रांति के इन दिनों में मेरे व्हाट्सएप पर बधाइयों की बाढ़ है। हर संदेश के साथ लड्डू, तिलकुट, पतंगें और मुस्कुराते इमोजी हैं। मोबाइल की स्क्रीन पर ये लड्डू देखकर मन में क्षणिक लालच भी आता है, लेकिन तुरंत एहसास होता है इन्हें खाया नहीं जा सकता। यह सिफऱ् एक छवि है, एक संकेत, एक भ्रम। शायद यही हमारी आज की जि़ंदगी का सबसे सटीक रूपक है सब कुछ है, पर छूने, महसूस करने और जीने लायक़ कुछ भी नहीं।
यही स्थिति संवेदनाओं की भी है। किसी के निधन पर संवेदना के सैकड़ों संदेश आते हैं, भावपूर्ण श्रद्धांजलि, ओम शांति, अत्यंत दु:खद। लेकिन वह संवेदना, जो कंधे पर हाथ रखे जाने से, गले मिलने से, साथ बैठकर चुप रहने से पैदा होती है, वह इन शब्दों में नहीं उतरती। मैं वर्चुअल संवेदना को उस तरह महसूस नहीं कर पाता, जैसे किसी की वास्तविक मौजूदगी में महसूस करता हूँ। और यक़ीनन, मेरे जैसे बहुत लोग होंगे, जो इस डिजिटल सहानुभूति को पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पा रहे।
विडंबना यह है कि जहां सबसे अधिक जीवंत रिश्तों और प्रत्यक्ष उपस्थिति की ज़रूरत होनी चाहिए, वहीं आदमी अनुपस्थित है। आज की पीढ़ी और सिफऱ् युवा ही नहीं—रिश्तों, प्रतिरोधों, प्रतिक्रियाओं, यहाँ तक कि क्रांंतियों को भी वर्चुअल दुनिया में निपटा रही है। लोग घर के ड्राइंग रूम में, रज़ाई में घुसे हुए, मोबाइल स्क्रीन पर उँगलियाँ चलाते हुए क्रांति का बिगुल फूँक रहे हैं और दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ दोहरा रहे हैं।
कैसे आकाश में सुराख हो सकता है नहीं,
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारों।
लेकिन यहां पत्थर उछाला नहीं जा रहा, सिफऱ् इमोजी फेंके जा रहे हैं। आज किसी भी मुद्दे पर जिसमें न आपकी सीधी भागीदारी है, न हस्तक्षेप का इरादा—आप सोशल मीडिया पर लंबी-लंबी प्रतिक्रियाएँ लिख सकते हैं। यह एक सुरक्षित सक्रियता (Safe Activism) है, जिसमें जोखिम शून्य है और आत्मसंतोष भरपूर। पर जहाँ वास्तविक उपस्थिति और हस्तक्षेप ज़रूरी था, वहाँ अक्सर चुप्पी और अनुपस्थिति दिखाई देती है।
पिछले महीने साहित्य जगत की दो घटनाएं इसका उदाहरण हैं। विनोद कुमार शुक्ल जैसे बड़े लेखक के निधन और उनकी जयंती के अवसर पर सोशल मीडिया श्रद्धांजलियों से भर गया, लेकिन ज़मीन पर वैसी उपस्थिति नहीं दिखी, जैसी दिखनी चाहिए थी। इसी तरह, मनोज रूपड़ा के साथ एक कुलपति के अपमानजनक व्यवहार का मामला, ऑनलाइन बहसों में ट्रेंड करता रहा, लेकिन वास्तविक विरोध, सामूहिक हस्तक्षेप और नैतिक दबाव लगभग नदारद रहा। सवाल यह है कि क्या हम साहित्य, समाज और लोकतांत्रिक मूल्यों के साथ भी अब ऑनलाइन मोड में ही जीना चाहते हैं?
देश के बड़े साहित्यकार हों या सामाजिक सरोकार आज उनकी जि़ंदगी, उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष पर लिखना आसान है। बधाइयाँ देना, श्रद्धांजलि पोस्ट करना, वर्चुअल मिठाइयाँ बाँटना, सब कुछ डिजिटल हो गया है। लेकिन यह वर्चुअल व्यवहार कब और कहाँ जाकर रुकेगा? क्या संबंध भी पूरी तरह वर्चुअल हो जाएँगे? पहले हम ‘डिस्टेंस रिलेशनशिपÓ की बात करते थे, जिसमें दूरी थी लेकिन सामने एक वास्तविक चेहरा, एक जीवित व्यक्ति था। अब एक नई स्थिति है—’वर्चुअल रिलेशनशिप। इसमें दूसरी तरफ़ कोई अभिव्यक्ति है, कोई प्रोफ़ाइल है, कोई अवतार है। वह व्यक्ति वास्तविक भी हो सकता है और पूरी तरह गढ़ा हुआ भी। सामने वाला अगर लाइव भी है, तब भी हम उसे वैसा नहीं जानते, जैसा वह वास्तव में है। हम सिफऱ् उसका प्रस्तुत संस्करण जानते हैं।
निदा फ़ाज़ली का शेर याद आता है—
हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो, कई बार देखना।
लेकिन सवाल यह है कि जब आदमी सामने ही न आए, जब उसकी उपस्थिति केवल स्क्रीन तक सीमित हो, तो उसे कई बार कैसे देखा जाए? उसके अनुभव, उसके सुख-दुख, उसकी खामोशी, उसकी आँखों की भाषा, इन सबको बिना मिले कैसे समझा जाए? वर्चुअल अंतरंगता इसीलिए एक भ्रम बन जाती है।
अब इस भ्रम को और गहरा कर रहा है आर्टिफि़शियल इंटेलिजेंस का दौर। एआई किसी आदमी का कोलन बनकर खड़ा हो सकता है—उसकी भाषा में लिख सकता है, उसकी तस्वीर बना सकता है, उसकी आवाज़ पैदा कर सकता है। ऐसे में यह तय करना भी मुश्किल हो गया है कि सामने जो है, वह सचमुच कोई व्यक्ति है या सिफऱ् एक निर्मित छाया। इस संदर्भ में मानवीय उपस्थिति, आमने-सामने मिलना, पहले से कहीं ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है।
बशीर बद्र का शेर अक्सर उद्धृत किया जाता है—
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से,
ये नए मिज़ाज का शहर है, जऱा फ़ासले से मिला करो।
यह शेर फ़ासले की बात करता है, लेकिन ‘मिलने की बात भी करता है। फ़ासले से ही सही, पर मिलना ज़रूरी है। आज समस्या फ़ासले की नहीं, अनुपस्थिति की है। मीटिंग्स आमने-सामने होने की जगह ज़ूम मीटिंग बन गई हैं। रिश्ते, बहसें, निर्णय सब कुछ वर्चुअल होता जा रहा है।
सवाल यह है कि क्या यह बदलाव हमारे कामकाज और संबंधों में सुधार ला रहा है, या यह पहले से मौजूद सामाजिक दूरी, अकेलेपन और अलगाव को और गहरा कर रहा है? शुरुआती शोध बताते हैं कि वर्चुअल संवाद ने सुविधा तो बढ़ाई है, लेकिन गहराई घटाई है। डिजिटल संपर्क त्वरित है, पर टिकाऊ नहीं। संवेदना व्यक्त करना आसान हुआ है, संवेदना महसूस करना कठिन।
मुझे वर्चुअल लड्डू नहीं चाहिए, क्योंकि भूख सिफऱ् स्वाद की नहीं होती साथ की होती है। मुझे वर्चुअल संवेदना भी नहीं चाहिए, क्योंकि दु:ख शब्दों से नहीं, उपस्थिति से हल्का होता है। शायद अब हमें यह तय करना होगा कि हम तकनीक का उपयोग इंसानी रिश्तों को बचाने के लिए करेंगे, या इंसान की जगह तकनीक को ही रिश्ता बना लेंगे। यह सिफऱ् तकनीक का सवाल नहीं है, यह हमारे समय की नैतिक और सामाजिक चुनौती है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *