महंगी गैस और कड़े नियम’—क्या अब बंद हो जाएंगे आम आदमी के चूल्हे?

चारामा -अनूप वर्मा
​इराक-ईरान युद्ध के 70 दिन: अंतरराष्ट्रीय तनाव का बोझ अब देश की सबसे गरीब थाली पर पड़ा है।
​सरकार ने गैस बचाने के लिए जो 45 और 25 दिन का ‘फॉर्मूला’ लागू किया है, वह कागजों पर तो मैनेजमेंट लग सकता है, लेकिन हकीकत में यह आम जनता के गले की फांस बन गया है। इस संकट ने न केवल घरों का बजट बिगाड़ा है, बल्कि उन हजारों परिवारों के सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा कर दिया है जिनका काम ही गैस सिलेंडर से चलता है।
​1. आम गृहिणी का दर्द: “सिलेंडर है या तिजोरी की चाबी?”
​गैस के बढ़ते दामों ने पहले ही मध्यम वर्गीय परिवारों की कमर तोड़ दी थी, ऊपर से इस ‘दिनों की पाबंदी’ ने रही-कही कसर पूरी कर दी। एक गृहिणी ने बताया, “पहले दाम बढ़े तो हमने आधा पेट खाना शुरू किया, अब सरकार कह रही है कि 45 दिन से पहले सिलेंडर नहीं मिलेगा। क्या युद्ध के नाम पर हम भूखे मर जाएं?”
​2. छोटे दुकानदार और होटल संचालक: “कारोबार पर ताला लगने की नौबत”
​इस नियम की सबसे करारी मार छोटे ढाबों, चाय की थड़ियों और रेहड़ी-पटरी वालों पर पड़ी है:
​होटल संचालक: एक सिलेंडर मुश्किल से 3-4 दिन चलता है। ऐसे में 25 या 45 दिन का नियम इनके लिए मौत के फरमान जैसा है। कई छोटे होटल मालिकों ने गैस की कमी और बढ़ते दामों के कारण शटर गिराना शुरू कर दिया है।
​चाय और नाश्ते के ठेले: “साहब, ब्लैक में सिलेंडर मिल रहा है जो हमारी कमाई से भी महंगा है। अगर सरकार ने नियम नहीं बदला तो हमें भीख मांगनी पड़ेगी।”
​3. ‘लाइसेंस राज’ और भ्रष्टाचार का खेल
​जनता में इस बात को लेकर भारी रोष है कि एक तरफ आम आदमी एक-एक किलो गैस के लिए तरस रहा है, वहीं दूसरी ओर रसूखदारों और कुछ स्थानीय नेताओं के संरक्षण में ‘गैस का काला बाजार’ फल-फूल रहा है। ग्रामीण लाइसेंस के नाम पर गैस की जो बंदरबांट हो रही है, उसने प्रशासन की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं।
​4. जनता के 3 कड़वे सवाल:
​दाम और किल्लत दोनों क्यों? अगर दाम बढ़ाए गए हैं तो कम से कम गैस की उपलब्धता तो सुनिश्चित होनी चाहिए।
​छोटे व्यापारियों के लिए क्या योजना है? क्या सरकार के पास उन लोगों के लिए कोई अलग कोटा है जिनका जीवन ही गैस पर निर्भर है?
​नियमों में ढील कब? 70 दिन बीत जाने के बाद भी सरकार वैकल्पिक इंतजाम करने में विफल क्यों रही है?
​निष्कर्ष:
यह केवल एक युद्ध का असर नहीं है, बल्कि एक आम आदमी के संवैधानिक हक—’सम्मान से जीने’—पर प्रहार है। यदि सरकार ने जल्द ही इन कठोर नियमों में ढील नहीं दी और बढ़ते दामों पर लगाम नहीं लगाई, तो सड़कों पर जनता का आक्रोश फूटने में देर नहीं लगेगी।

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