नई दिल्ली। दिल्ली हाई कोर्ट ने राजधानी के शिक्षा जगत और सरकारी सिस्टम में चल रहे एक बड़े खेल पर कड़ी नाराजगी जताई है। कोर्ट ने एक रुपये की सालाना लीज पर मिली स्कूल की जमीन को बैंक में गिरवी रखकर करोड़ों का कर्ज लेने के मामले में डीडीए (DDA), दिल्ली सरकार और संबंधित स्कूल सोसायटी को जमकर फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की पीठ ने दो टूक कहा कि जिस जमीन का आवंटन बच्चों के भविष्य के लिए हुआ था, उसे कारोबार में बदल दिया गया है।
शिक्षा निदेशालय की अनुमति के बिना कैसे लिया लोन?
अदालत ने सवाल उठाया कि बिना शिक्षा निदेशालय की मंजूरी के स्कूल की जमीन को गिरवी कैसे रखा जा सकता है? नियमों के मुताबिक, रियायती दर पर मिली जमीन का उपयोग केवल शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए ही हो सकता है। मामले की सुनवाई के दौरान पता चला कि दक्षिणी दिल्ली के एक नामी निजी स्कूल ने 1988 में डीडीए से लीज पर मिली 4 एकड़ जमीन को गिरवी रखकर 2.20 करोड़ रुपये का ऋण लिया और उसे चुकाया भी नहीं।
नीलामी की कगार पर स्कूल, सरकारी तंत्र सुस्त
कर्ज न चुकाने के कारण बैंक ने स्कूल की जमीन की नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दी थी, जिसे फिलहाल रोक दिया गया है। कोर्ट ने इस बात पर भी हैरानी जताई कि शिक्षा निदेशालय ने तीन साल पहले स्कूल को अपने नियंत्रण में लेने का भरोसा दिया था, लेकिन अब तक जमीन का कब्जा नहीं लिया गया। याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि यह अकेला मामला नहीं है; दिल्ली की लगभग 37 अन्य स्कूल सोसायटियां भी इसी तरह लीज की जमीन पर करोड़ों का कर्ज उठाकर निजी स्वार्थ सिद्ध कर रही हैं।
176 स्कूलों में गड़बड़ी: जमीन पर बन गए मकान
हाई कोर्ट ने शिक्षा निदेशालय के उस पुराने हलफनामे का भी जिक्र किया जिसमें स्वीकार किया गया था कि 176 निजी स्कूलों के निरीक्षण में भारी अनियमितताएं मिली हैं। सस्ती दरों पर मिली इन जमीनों पर कई जगह लोग मकान बनाकर रह रहे हैं, जबकि वहां स्कूल होना चाहिए था।
अस्पतालों को भी लग चुकी है फटकार
कोर्ट ने निजी अस्पतालों का उदाहरण देते हुए याद दिलाया कि हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी सर गंगाराम और फोर्टिस जैसे 51 बड़े अस्पतालों को फटकार लगाई थी। इन अस्पतालों ने भी रियायती जमीन लेने के बावजूद गरीबों को मुफ्त इलाज देने की शर्त का उल्लंघन किया था। हाई कोर्ट ने साफ किया कि अब इस ‘लचर रवैये’ को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।