मादक पदार्थों के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई: छत्तीसगढ़ में एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ में नशे के बढ़ते जाल को तोडऩे की दिशा में राज्य सरकार द्वारा जिला स्तरीय एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स के गठन का निर्णय केवल एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि एक सामाजिक और रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जाना चाहिए। वित्तीय वर्ष 2025-26 के बजट में 10 जिलों के लिए 100 नए पदों की स्वीकृति इस बात का संकेत है कि सरकार अब नशे को कानून-व्यवस्था की हाशिये की समस्या नहीं, बल्कि राज्य के सामाजिक स्वास्थ्य और भविष्य के लिए गंभीर खतरे के रूप में स्वीकार कर रही है।
यह फैसला ऐसे दौर में आया है जब नशे का कारोबार किसी एक राज्य या क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है। ‘उड़ता पंजाब जैसे प्रतीकात्मक मुहावरे अब पूरे देश पर लागू होने लगे हैं। छत्तीसगढ़ भी इस वैश्विक नेटवर्क से अछूता नहीं है। गांजा, अफीम, चिट्टा, एमडीएमए जैसे सिंथेटिक ड्रग्स और अवैध शराब का व्यापार आज स्थानीय तस्करों की छोटी गतिविधि नहीं, बल्कि अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फैले संगठित अपराध का हिस्सा बन चुका है।
छत्तीसगढ़ की भौगोलिक स्थिति इसे इस नेटवर्क में विशेष रूप से संवेदनशील बनाती है। ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, झारखंड और तेलंगाना से लगी सीमाएं इसे एक स्वाभाविक ट्रांजिट कॉरिडोर बनाती हैं। ओडिशा-आंध्र क्षेत्र से गांजे की मजबूत सप्लाई लाइन, उत्तर भारत से अफीम, महानगरों से सिंथेटिक ड्रग्स और स्थानीय स्तर पर अवैध शराब—ये सभी प्रवाह राज्य के अलग-अलग हिस्सों में मिलते हैं। बस्तर और सरगुजा जैसे क्षेत्रों में जंगल और सीमावर्ती हालात तस्करों को छिपने का अवसर देते हैं, जबकि रायपुर, दुर्ग और बिलासपुर जैसे शहरी इलाकों में सफेद नशे की खपत तेजी से बढ़ी है।
नशे के इस कारोबार को केवल छत्तीसगढ़ की समस्या मानना वास्तविकता से आंख चुराने जैसा होगा। यह नेटवर्क दक्षिण-पूर्व एशिया के गोल्डन ट्रायंगल, अफगानिस्तान-ईरान क्षेत्र, यूरोपीय सिंथेटिक ड्रग बाजारों और भारत के महानगरों से होते हुए यहां तक पहुंचता है। कई मामलों में ड्रग तस्करी का पैसा मनी लॉन्ड्रिंग, हथियारों की तस्करी और अन्य संगठित अपराधों से भी जुड़ा पाया गया है। ऐसे में राज्य स्तर पर की गई कार्रवाई तभी प्रभावी होगी, जब वह इस वैश्विक अपराध की स्थानीय कड़ी को समझते हुए की जाए।
यहीं एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स की भूमिका अहम हो जाती है। यह इकाई सामान्य पुलिस व्यवस्था से अलग, केवल नशा विरोधी अपराधों पर केंद्रित रहेगी। इंटेलिजेंस आधारित कार्रवाई, सप्लाई चेन की पहचान, अंतरराज्यीय लिंक पर निगरानी और नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो व अन्य एजेंसियों से समन्वय—ये सभी तत्व इसे पारंपरिक पुलिसिंग से अलग और अधिक प्रभावी बनाते हैं। स्थानीय दबावों से अपेक्षाकृत मुक्त होकर काम करने की इसकी क्षमता, बड़े नेटवर्क तक पहुंचने में निर्णायक साबित हो सकती है।
हाल के वर्षों में यह भी सामने आया है कि नशे के कारोबार और उपभोग में केवल हाशिये के लोग ही नहीं, बल्कि समाज के प्रभावशाली और संपन्न वर्गों के युवा भी शामिल पाए गए हैं। कई मामलों का दब जाना इस बात की चेतावनी है कि यदि कार्रवाई समान और पारदर्शी नहीं हुई, तो यह पूरी कवायद केवल छोटे तस्करों तक सिमट कर रह जाएगी। नशे के खिलाफ लड़ाई तभी विश्वसनीय होगी, जब कानून सभी के लिए समान रूप से लागू होता दिखे।
छत्तीसगढ़ में हाल ही में लागू की गई पुलिस कमीश्नर प्रणाली के बाद एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स का गठन एक महत्वपूर्ण अगला कदम है। कमीश्नर प्रणाली ने शहरी पुलिसिंग को तेज और निर्णयक्षम बनाया है, जबकि टास्क फोर्स उसे विशेषज्ञता और स्पष्ट फोकस प्रदान करेगी। यह संयोजन राज्य की आंतरिक सुरक्षा और सामाजिक संतुलन के लिए दूरगामी असर डाल सकता है।
फिर भी, यह समझना जरूरी है कि नशे की समस्या केवल कानून और पुलिस की नहीं है। यह युवाओं के भविष्य, परिवारों की स्थिरता और समाज की नैतिक सेहत से जुड़ा सवाल है। केवल धरपकड़ और सजा से इस प्रवृत्ति पर पूर्ण विराम नहीं लगेगा। जागरूकता, शिक्षा, पुनर्वास और सामाजिक भागीदारी के बिना यह लड़ाई अधूरी रहेगी।
एंटी नारकोटिक्स टास्क फोर्स का गठन छत्तीसगढ़ सरकार की गंभीर मंशा को दर्शाता है। अब चुनौती यह है कि इसे पर्याप्त संसाधन, वास्तविक स्वतंत्रता और निरंतर राजनीतिक-प्रशासनिक समर्थन मिले। यदि यह टास्क फोर्स अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़े इस अपराध को उसकी जड़ों तक जाकर चुनौती दे पाती है, तो यह केवल तस्करी पर अंकुश नहीं लगाएगी, बल्कि छत्तीसगढ़ को नशे की गिरफ्त से बाहर निकालने की दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित होगी।

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