बिलासपुर, 21 जनवरी 2026: छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाई कोर्ट ने बुजुर्गों की सुरक्षा और उनके सम्मान को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। जस्टिस एन.के. व्यास की सिंगल बेंच ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी बुजुर्ग से दान (Gift Deed) में संपत्ति लेता है, तो यह उसकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है कि वह उस बुजुर्ग की सेवा और देखभाल करे। कोर्ट ने कहा कि भले ही दान के कागजों में सेवा करने की शर्त ‘लिखी’ न हो, फिर भी यह जिम्मेदारी जुड़ी रहती है। इसी के साथ कोर्ट ने एक भतीजे द्वारा कब्जाई गई संपत्ति की गिफ्ट डीड रद्द कर दी है।
भतीजे और बेटी ने बुजुर्ग दंपति को निकाला था घर से
पूरा मामला बिलासपुर के कोनी निवासी 83 वर्षीय सुरेशमणि तिवारी और उनकी 80 वर्षीय पत्नी लता तिवारी का है। इस बुजुर्ग दंपति का अपना कोई बेटा नहीं है। उन्होंने इस उम्मीद में साल 2016 में अपने भतीजे रामकृष्ण पांडेय को अपना 1250 वर्ग फीट का मकान और जमीन दान में दे दी थी कि बुढ़ापे में वह उनका सहारा बनेगा। लेकिन संपत्ति हाथ लगते ही भतीजे और बेटी के सुर बदल गए। उन्होंने बुजुर्गों को ऊपरी मंजिल पर रहने को मजबूर किया, बिजली काट दी, एटीएम से 30 लाख रुपये निकाल लिए और अंत में उन्हें घर से बेदखल कर दिया। लाचार होकर दंपति को वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी।
कानून क्या कहता है? (माता-पिता भरण-पोषण अधिनियम 2007)
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ‘माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007’ की धारा 23 का हवाला दिया। इस कानून में प्रावधान है कि अगर कोई बुजुर्ग अपनी संपत्ति किसी को देता है और वह व्यक्ति उनकी बुनियादी जरूरतों (भोजन, स्वास्थ्य, देखभाल) को पूरा नहीं करता, तो उस संपत्ति के हस्तांतरण को धोखाधड़ी माना जाएगा। कोर्ट ने साफ कहा कि यह एक ‘कल्याणकारी कानून’ है और इसका उद्देश्य बुजुर्गों की रक्षा करना है, न कि कठोर नियमों में उलझना।
हाई कोर्ट ने दिया घर वापस दिलाने का आदेश
जस्टिस एन.के. व्यास ने अपने फैसले में लिखा कि याचिकाकर्ता (भतीजा) अपने दायित्वों को निभाने में पूरी तरह फेल रहा है। कोर्ट ने कहा कि गिफ्ट डीड ‘प्यार और स्नेह’ के आधार पर दी गई थी, जिसमें सेवा की शर्त छिपी हुई थी। जब इस शर्त का उल्लंघन हुआ और बुजुर्गों को प्रताड़ित किया गया, तो संपत्ति वापस मिलना तय है। हाई कोर्ट ने एसडीएम और कलेक्टर के पिछले फैसले को सही ठहराते हुए भतीजे की याचिका खारिज कर दी और बुजुर्ग दंपति को उनकी संपत्ति पर फिर से काबिज होने का आदेश दिया।