रायपुर । आज जब पत्रकारिता पूरी तरह बाजारवाद की चपेट में है और खबरों से ,समाचार से ज्यादा विज्ञापन को महत्व दी दिया जा रहा है तब एक समय ऐसा भी था जब बबन प्रसाद मिश्र जैसे पत्रकार ने अखबार के फ्रंट पेज पर उनके बिना जानकारी के छापे विज्ञापन की वजह से अपने पद से इस्तीफा दे दिया।
आज तो अखबार में एक नहीं चार-चार फ्रंट पेज निकाले जा रहे है चारों में विज्ञापन दिया जा रहा हैं ,यह पत्रकारिता के बदलते मूल्य की शुरुआत थी और कुछ लोग ऐसे होते हैं कि जो बदलते मूल्यों के साथ समझौता नहीं करते हैं उनमें से एक थे बबन प्रसाद मिश्र ।

समाचार अखबारों की बदलती प्राथमिकताओं के साथ समझौता नहीं करने की वजह से उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दिया। आज स्वर्गीय श्री बबन प्रसाद मिश्र जी की जयंती है। यह अवसर केवल एक व्यक्तित्व को स्मरण करने का नहीं, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की उस परंपरा को नमन करने का दिन है, जिसमें सत्य, साहस और सिद्धांत सर्वोपरि रहे हैं। बबन प्रसाद मिश्र पत्रकारिता के वो अटल आधार स्तंभ थे, जिन्होंने मूल्यों की पत्रकारिता को न सिर्फ जिया, बल्कि उसे अपने जीवन की तरह साधा। वे उन दुर्लभ पत्रकारों में थे, जिन्होंने कलम को कभी सत्ता का औज़ार नहीं बनने दिया, बल्कि उसे समाज के प्रति जवाबदेह एक जीवंत मशाल की तरह थामे रखा।
उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन में पत्रकारिता के उन व्यापक और शाश्वत मापदंडों को न केवल बनाए रखा, बल्कि उन्हें दुनिया की सबसे बड़ी ताकत और जिम्मेदारी का दर्जा दिया। उनकी लेखनी और उनके जीवन में मूल्य इतने गहराई से रचे-बसे थे कि आज भी वे उतनी ही चमक के साथ दिखाई देते हैं। यही कारण है कि बबन प्रसाद मिश्र ने जो लिखा, वह किसी व्यक्ति या संस्था के लिए नहीं, बल्कि उन पत्रकारों के लिए समर्पित रहा जो आज भी अपनी अस्मिता, स्वतंत्रता और नैतिक दायित्व के प्रति सजग हैं।
आज के दौर की पत्रकारिता पर नज़र डालें तो स्पष्ट दिखता है कि संपादक का स्थान प्रबंधन ने ले लिया है। स्वतंत्र सोच, निर्भीक लेखन और जनपक्षधर पत्रकारिता की जगह चरण-वंदन, सत्ता-समीकरण और विज्ञापन की होड़ ने ले ली है। अखबार के पहले पन्ने पर खबर छपे या विज्ञापन इससे अधिक फर्क नहीं पड़ता, बस कमाई होनी चाहिए। इसी पतनशील समय पर बबन प्रसाद मिश्र की वैचारिक दृढ़ता और नैतिक ऊँचाई और अधिक प्रासंगिक हो जाती है।उनकी पुस्तक ‘मैं और मेरी पत्रकारिता’ केवल आत्ममंथन नहीं, बल्कि पत्रकारिता के वर्तमान और भविष्य पर एक गंभीर चेतावनी है। वे लिखते हैं:-
“देशभक्ति के लिए निकले समाचार पत्र का स्वरूप शनैः शनैः राजभक्ति के अखबार का हो गया था… आज तो अखबारों में राजभक्ति की जैसे होड़ सी मची हुई है।”
यह कथन किसी आवेग का परिणाम नहीं, बल्कि उस कठोर सत्य का उद्घाटन है, जो पत्रकारिता के आत्मसम्मान को भीतर तक झकझोर देता है।

बबन प्रसाद मिश्र ने पत्रकारिता में ऐसे उच्च मानक स्थापित किए, जिनकी कल्पना आज दुर्लभ हो चली है। वे ऐसे संपादक थे जिन्होंने किसी अखबार के सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी यह कहने में संकोच नहीं किया कि यदि उनके बिना जानकारी के पहले पन्ने पर विज्ञापन छप सकता है, तो वे उस पद पर नहीं रहेंगे। संपादक पद छोड़ देना उनके लिए त्याग नहीं, बल्कि मूल्यों की रक्षा का स्वाभाविक निर्णय था। यह उदाहरण आज की पत्रकारिता के लिए एक मौन प्रश्न भी है और एक जीवंत आदर्श भी।
दैनिक नवभारत और युगधर्म, रायपुर जैसे प्रतिष्ठित समाचार पत्रों के पूर्व संपादक रहे बबन जी, जनधारा के प्रधान संपादक भी रहे। उनकी कलम में सच्चाई की वह आग थी, जो सत्ता के दबाव, प्रबंधन के संकेत और समझौते की राजनीति से कभी ठंडी नहीं पड़ी।
उनकी जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए जबलपुर के वरिष्ठ पत्रकार और मध्यप्रदेश हिंदी एक्सप्रेस के संपादक रविंद्र बाजपेयी ने भावुक शब्दों में कहते हैं कि छात्र जीवन में ही उन्होंने बबन जी के डिक्टेशन लेकर पत्रकारिता का पहला पाठ पढ़ा। उनके अनुसार, पूरे जीवन संघर्ष करते रहने के बावजूद चेहरे की निश्छल मुस्कान उनकी पहचान थी। आत्मीयता, संबंधों का निःस्वार्थ निर्वहन और मानवीय संवेदनाएँ उनके वे गुण थे, जिन्होंने उन्हें गहराई तक संस्कारित किया।

वहीं माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार एवं शिक्षक श्री संजय द्विवेदी उन्हें हिंदी पत्रकारिता का यशस्वी हस्ताक्षर और मार्गदर्शक बताते हैं। उनके अनुसार बबन प्रसाद मिश्र जी का लेखन, उनके सरोकार और उनका व्यक्तित्व पत्रकारिता के नैतिक मूल्यों का जीवंत उदाहरण है, जिसे भुलाया नहीं जा सकता।

छत्तीसगढ़ विजुअल एंड आर्ट सोसाइटी के अध्यक्ष एवं स्वर्गीय श्री बबन प्रसाद मिश्र जी के छोटे भाई सुभाष मिश्र ने जयंती पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि बबन प्रसाद मिश्र केवल उनके बड़े भाई ही नहीं, बल्कि जीवन भर मार्गदर्शन देने वाले एक नैतिक प्रकाशस्तंभ थे। उन्होंने कहा कि बबन जी ने पत्रकारिता को कभी पद या प्रतिष्ठा का साधन नहीं बनने दिया और सिद्धांतों के साथ समझौता किए बिना जीवन जिया। उनके विचार, उनका साहस और मूल्यनिष्ठा आज भी उन्हें और समाज को सही दिशा दिखाने का काम कर रहे हैं।
आज स्वर्गीय श्री बबन प्रसाद मिश्र जी की जयंती पर उनका पुण्य स्मरण करते हुए यह कहना अनुचित नहीं होगा कि वे केवल एक व्यक्ति नहीं थे, बल्कि पत्रकारिता की वह आत्मा थे, जो सत्य के साथ खड़ी रहती है, चाहे समय कितना ही कठिन क्यों न हो। उनकी स्मृति, उनकी सोच और उनके मूल्य आने वाली पीढ़ियों के लिए सदैव प्रकाशपुंज बने रहेंगे।उनकी पावन स्मृति को श्रद्धापूर्वक नमन।