आषाढ़ कृष्ण त्रयोदशी: आज है वर्ष का पहला रवि प्रदोष व्रत, जानें पूजा का समय और नियम

आध्यात्मिक डेस्क। सनातन परंपरा में महादेव की कृपा पाने का सबसे पावन और अचूक दिन माना जाने वाला ‘प्रदोष व्रत’ आज श्रद्धा के साथ मनाया जा रहा है। आषाढ़ महीने का यह पहला प्रदोष व्रत है और रविवार के दिन पड़ने के कारण इसे रवि प्रदोष व्रत के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि जब त्रयोदशी तिथि और रविवार का अनूठा संयोग बनता है, तो इस दिन की गई शिव साधना से भक्तों के जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं और सुख-समृद्धि का वास होता है।

आज शाम 2 घंटे 2 मिनट का विशेष ‘महामुहूर्त’
प्रदोष व्रत में सबसे महत्वपूर्ण समय ‘प्रदोष काल’ यानी सूर्यास्त के ठीक बाद का माना जाता है। ज्योतिष गणना (द्रिक पंचांग) के अनुसार, आज शिव आराधना के लिए बेहद शुभ समय मिलने वाला है:

पूजा का शुभ समय: शाम 07:22 बजे से शुरू होकर रात 09:24 बजे तक रहेगा।

महत्व: इस 2 घंटे और 2 मिनट की अवधि में किया गया शिवलिंग का अभिषेक और पूजन सीधे महादेव तक पहुँचता है और त्वरित फल प्रदान करता है।

इस आसान विधि से करें भोलेनाथ को प्रसन्न
यदि आप आज व्रत रख रहे हैं, तो शाम की पूजा में इन सरल लेकिन प्रभावशाली चरणों का पालन करें:

संकल्प और सात्विकता: सुबह स्नान के बाद व्रत का मन में संकल्प लें और पूरे दिन मन को शांत व सात्विक रखें।

शाम का महाअभिषेक: शुभ मुहूर्त में शिवलिंग पर गंगाजल, दूध या गन्ने के रस से अभिषेक करें।

प्रिय वस्तुएं अर्पित करें: महादेव को अत्यंत प्रिय बेलपत्र, धतूरा, श्वेत फूल और नैवेद्य (भोग) अर्पित करें।

मंत्र और पाठ: पूजा के दौरान निरंतर ‘ॐ नमः शिवाय’ का मानसिक जाप करते रहें। इसके बाद शिव चालीसा और अंत में माता पार्वती व शिव जी की आरती करें।

क्यों खास है रवि प्रदोष व्रत का महत्व?
शास्त्रों के अनुसार, वैसे तो हर महीने के दोनों पक्षों (कृष्ण और शुक्ल) की त्रयोदशी शिव को समर्पित है, लेकिन रविवार के दिन प्रदोष व्रत रखने का विशेष फल मिलता है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से:

सेहत से जुड़ी बड़ी से बड़ी परेशानियां और बीमारियां दूर होती हैं।

करियर में आ रही रुकावटें खत्म होती हैं और मान-सम्मान में वृद्धि होती है।

वैवाहिक जीवन और संतान सुख से जुड़ी हर मनोकामना पूरी होती है।

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