लोकसभा में सोमवार को नक्सलवाद जैसे गंभीर और संवेदनशील मुद्दे पर हुई चर्चा ने छत्तीसगढ़ की राजनीति में अचानक हलचल मचा दी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के एक बयान ने न केवल सियासी तापमान बढ़ाया, बल्कि सत्ता और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप की नई पटकथा भी लिख दी।
गृह मंत्री ने सदन में दावा किया कि भारत अब लगभग नक्सल-मुक्त हो चुका है और 31 मार्च 2026 तक तय लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। लेकिन इस दावे के साथ ही उन्होंने छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि राज्य में नक्सलवाद के खात्मे में देरी की वजह कांग्रेस का रवैया था। उनका तीखा बयान “भूपेश बघेल को पूछो, प्रूफ दूं क्या” सियासी गलियारों में गूंजने लगा।

जवाबी हमले में कांग्रेस, बघेल ने दी खुली चुनौती
गृह मंत्री के इस बयान पर पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने तुरंत पलटवार किया। उन्होंने इसे “सरासर झूठ” करार देते हुए कहा कि यदि केंद्र के पास कोई ठोस सबूत था, तो उसे पहले सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। बघेल ने न केवल सरकार के दावों पर सवाल उठाए, बल्कि खुली बहस की चुनौती भी दे डाली – “जहां, जिस मंच पर कहेंगे, मैं तैयार हूं।”
बघेल ने अपनी सरकार के कार्यकाल का हवाला देते हुए कहा कि नक्सल समस्या से निपटने के लिए राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर कई प्रयास किए गए। स्कूल, आंगनबाड़ी और पीडीएस जैसी मूलभूत सुविधाओं को बस्तर तक पहुंचाना उसी रणनीति का हिस्सा था। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि केंद्र सरकार ने नक्सलमुक्त गांवों को एक करोड़ रुपये देने का वादा किया था – “अब बताइए, वो पैसा कब मिलेगा?”

सत्ता पक्ष का समर्थन, ‘ऐतिहासिक दिन’ बताया
जहां एक ओर विपक्ष हमलावर है, वहीं राज्य की मौजूदा सरकार इस मुद्दे को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने इसे “छत्तीसगढ़ के लिए ऐतिहासिक दिन” बताते हुए कहा कि प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के दृढ़ संकल्प तथा सुरक्षा बलों के पराक्रम से नक्सलवाद पर निर्णायक प्रहार हुआ है। उन्होंने विशेष रूप से बस्तर क्षेत्र का जिक्र करते हुए कहा कि चार दशकों से विकास से वंचित यह इलाका अब नई दिशा में बढ़ रहा है।

चरणदास महंत का संतुलित लेकिन चुभता बयान
इसी बीच नेता प्रतिपक्ष चरणदास महंत का बयान इस बहस में एक नया आयाम जोड़ता है। उन्होंने कहा कि यदि नक्सलवाद सच में खत्म हो गया है तो यह स्वागत योग्य है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे अलग हो सकती है।
महंत ने स्पष्ट शब्दों में कहा “अभी नक्सलवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है, केवल सशस्त्र नक्सली कम हुए हैं। नक्सली विचारधारा अभी भी मौजूद है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि हाल के सरेंडर में डर, भय और लालच जैसे कारण भी शामिल हो सकते हैं।
महंत का यह बयान न केवल केंद्र और राज्य सरकार के दावों पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी संकेत देता है कि समस्या की जड़ें अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। उन्होंने यह भी कहा कि बस्तर के लोगों की सुरक्षा करना सरकार का सबसे बड़ा धर्म है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।।

असली सवाल: नक्सलवाद खत्म या सियासत शुरू?
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या वाकई नक्सलवाद अपने अंतिम चरण में है, या यह मुद्दा अब सियासी विमर्श का नया हथियार बन गया है? एक ओर केंद्र और राज्य सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं, वहीं विपक्ष इसके दावों की विश्वसनीयता पर सवाल उठा रहा है।
नक्सलवाद, जो दशकों से छत्तीसगढ़ की पहचान और चुनौती दोनों रहा है, अब एक नए मोड़ पर खड़ा है। लेकिन इस संवेदनशील मुद्दे पर जिस तरह की बयानबाजी सामने आ रही है, वह यह भी संकेत देती है कि जमीनी सच्चाई से ज्यादा अब राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई तेज हो चुकी है।
आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह सियासी टकराव सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहता है या वाकई किसी ठोस बहस और समाधान की दिशा में आगे बढ़ता है। फिलहाल इतना तय है नक्सलवाद पर जीत के दावों से ज्यादा, इस मुद्दे पर सियासत की लड़ाई चर्चा के केंद्र में है।