Ambedkar Hospital Raipur : रायपुर: मौत कब और किस रूप में सामने आ जाए, कोई नहीं जानता। रायपुर के एक 40 वर्षीय दुकानदार के लिए एक सामान्य सुबह की शुरुआत किसी खौफनाक मंजर में बदल जाएगी, इसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। रोज की तरह सुबह ब्रश करते समय अचानक उनकी गर्दन की मुख्य नस (Artillery) फट गई। लेकिन, डॉ. भीमराव अंबेडकर स्मृति चिकित्सालय के डॉक्टरों ने मौत के मुंह से मरीज को खींचकर चिकित्सा जगत में एक नया इतिहास रच दिया है।
Ambedkar Hospital Raipur : सस्पेंस और दहशत: ब्रश थामे हाथ और अचानक बेहोशी राजधानी के एक इलाके में रहने वाले शख्स सुबह अपने घर में ब्रश कर रहे थे। सबकुछ सामान्य था, तभी अचानक उन्हें लगा जैसे उनकी गर्दन के भीतर कुछ ब्लास्ट हुआ हो। असहनीय दर्द और कुछ ही पलों में गर्दन का गुब्बारे की तरह फूल जाना—यह सब इतना तेज था कि जब तक परिजन कुछ समझ पाते, मरीज जमीन पर गिरकर बेहोश हो चुका था।
परिजन आनन-फानन में उन्हें अंबेडकर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड लेकर पहुंचे, जहाँ डॉक्टरों के सामने एक ऐसी पहेली थी जिसे सुलझाना लगभग नामुमकिन लग रहा था।
मेडिकल साइंस भी रह गया दंग: दुनिया का 11वां दुर्लभ मामला
जब अस्पताल के हार्ट, चेस्ट एवं वैस्कुलर सर्जरी विभाग ने मरीज की सीटी एंजियोग्राफी की, तो रिपोर्ट देखकर विशेषज्ञों के होश उड़ गए। मरीज की दायीं कैरोटिड आर्टरी (मस्तिष्क को रक्त पहुँचाने वाली सबसे मुख्य नस) बिना किसी बाहरी चोट या बीमारी के स्वतः ही फट चुकी थी। मेडिकल साइंस की भाषा में इसे ‘स्पॉन्टेनियस कैरोटिड आर्टरी रप्चर’ (SCAR) कहते हैं।
विभागाध्यक्ष डॉ. कृष्णकांत साहू के अनुसार, मेडिकल जर्नल बताते हैं कि पूरी दुनिया में अब तक ऐसे केवल 10 मामले ही सामने आए हैं। रायपुर का यह केस दुनिया का 11वां और छत्तीसगढ़ का पहला ऐसा दुर्लभ मामला बन गया है।
सर्जरी की मेज पर ‘अग्निपरीक्षा’: लकवे और मौत का साया
डॉ. साहू के नेतृत्व में जब इस जटिल ऑपरेशन की शुरुआत हुई, तो चुनौती हिमालय जैसी थी। सर्जरी की सफलता की उम्मीद महज 50-60% थी। सबसे बड़ा खतरा यह था कि अगर सर्जरी के दौरान खून का एक छोटा सा कतरा (Clot) मस्तिष्क की ओर चला जाता, तो मरीज को तत्काल लकवा मार सकता था या उसकी मौके पर ही मौत हो सकती थी।
डॉक्टरों की टीम ने घंटों तक चले इस हाई-वोल्टेज ऑपरेशन में बारीकी से नस की मरम्मत की और ‘स्यूडोएन्यूरिज्म’ (खून का गुब्बारा) को हटाकर रक्त प्रवाह को सुचारू किया।
सफलता के सूत्रधार: विशेषज्ञों की टीम
इस ऐतिहासिक सफलता में डॉ. कृष्णकांत साहू के साथ एनेस्थेटिस्ट डॉ. संकल्प दीवान, डॉ. बालस्वरूप साहू और जूनियर डॉक्टर्स की एक बड़ी टीम शामिल रही। मेडिकल कॉलेज के डीन डॉ. विवेक चौधरी और सुपरिटेंडेंट डॉ. संतोष सोनकर ने इसे संस्थान के लिए एक ‘मील का पत्थर’ करार दिया है।