सरगुजा की बदलती तस्वीरः चूल्हे-चौके से ’लखपति दीदी’ बनने तक का सफरआत्मनिर्भरता की नई इबारत लिख रहीं जिले की महिलाएं ।

(अम्बिकापुर ) 08 मार्च “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः“- भारतीय संस्कृति के इस मूलमंत्र को सरगुजा की कर्मठ महिलाएं आज धरातल पर चरितार्थ कर रही हैं।
8 मार्च को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो सरगुजा जिले में महिला सशक्तिकरण की एक ऐसी लहर दिखाई देती है, जिसने न केवल घरों की आर्थिक स्थिति बदली है, बल्कि समाज की सोच में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लाया है।

स्व-सहायता समूहों से मिला स्वावलंबन का मंत्र.
सरगुजा के दूरस्थ वनांचलों से लेकर शहरी क्षेत्रों तक, महिलाओं की सफलता के पीछे बिहान (राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन) और स्व-सहायता समूहों का बड़ा हाथ है। जो महिलाएं कभी केवल घरेलू कामकाज तक सीमित थीं, वे आज मशरूम उत्पादन, बाड़ी विकास, हस्तशिल्प और खाद्य प्रसंस्करण जैसे लघु उद्योगों के माध्यम से अपने परिवार की मुख्य आय स्रोत बन चुकी हैं।
समूहों के माध्यम से मिले प्रशिक्षण और वित्तीय सहायता ने इन्हें ’उद्यमी’ के रूप में नई पहचान दी है।

शिक्षा और स्वास्थ्य की बनीं सशक्त प्रहरी
जिले में शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अतुलनीय है। आज सरगुजा की बेटियां केवल स्कूल-कॉलेज तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि पंचायत प्रतिनिधि के तौर पर गांवों का नेतृत्व कर रही हैं।
मितानिनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के रूप में वे दुर्गम क्षेत्रों तक सरकारी योजनाओं का लाभ पहुंचा रही हैं।
शिक्षा के प्रति बढ़ती जागरूकता का ही परिणाम है कि जिले की छात्राएं अब बिलासपुर और रायपुर जैसे महानगरों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर जिले का नाम रोशन कर रही हैं।

शासन की योजनाओं से मिला संबल
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में प्रदेश सरकार द्वारा संचालित ’महतारी वंदन योजना’ जैसी पहलों ने महिलाओं को आर्थिक आजादी दी है।
सरगुजा की हजारों हितग्राही महिलाएं इस राशि का उपयोग बच्चों की शिक्षा और छोटे व्यवसायों के विस्तार में कर रही हैं। जिला प्रशासन द्वारा दिए जा रहे कौशल विकास प्रशिक्षण और बाजार उपलब्ध कराने की पहल से सरगुजा के उत्पाद अब राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना रहे हैं।

चुनौतियां बनीं सफलता की सीढ़ी.
भौगोलिक विषमताओं और सामाजिक रूढ़ियों जैसी कई चुनौतियां आज भी मौजूद हैं, लेकिन सरगुजा की नारी शक्ति ने अपने दृढ़ संकल्प से इन बाधाओं को पार किया है।
आज सरगुजा की महिलाएं आत्मनिर्भरता की वह कहानी लिख रही हैं, जहाँ वे स्वयं के साथ-साथ दूसरों के लिए भी रोजगार के अवसर पैदा कर रही हैं।

सशक्त नारी, समृद्ध सरगुजा.
महिला दिवस महज एक औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि सरगुजा की उन हजारों ’हरमनिया’, ’सुनैना’,’रत्ना मजुमदार’,’बिंदू दास’ और ’शीला केरकेट्टा’ जैसी सैकड़ों महिलाओं के संघर्ष और जीत का उत्सव है।
यह साबित हो चुका है कि जब महिलाओं को अवसर और उचित मंच मिलता है, तो वे समाज और राष्ट्र के नवनिर्माण में अपनी अग्रणी भूमिका निभाती हैं।

( हिंगोरा सिंह. सरगुजा )

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