ऑस्ट्रेलिया के जन जीवन में पब्लिक ट्रांसपोर्ट

ऑस्ट्रेलिया से सुभाष मिश्र

भारत के महानगरों और बड़े शहरों में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा आज भीआधी-अधूरी है। सरकार इसे आम आदमी की सुविधा की प्राथमिकता में गिनती भी नहीं करती है । मेट्रो ट्रेन ने कुछ हद तक राहत ज़रूर दी है, लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी आबादी के अनुपात में पब्लिक ट्रांसपोर्ट के साधन अभी भी बेहद कम हैं। बस या ट्रेन कब आएगी, आएगी भी या नहीं ,यह अनिश्चितता लोगों को मजबूर करती है कि वे ईएमआई पर अपनी बाइक या कार खरीदें। नतीजा यह है कि कॉलोनियों और मोहल्लों में पार्किंग की मारामारी है, सार्वजनिक पार्किंग की जगहें या तो सीमित हैं या अतिक्रमण की शिकार।

यही कारण है कि जीवन की वास्तविक गतिशीलता में पब्लिक ट्रांसपोर्ट की भागीदारी वैसी नहीं बन पाई है , जैसी मैंने ऑस्ट्रेलिया में अपने हालिया प्रवास के दौरान महसूस की। यहाँ पब्लिक ट्रांसपोर्ट केवल साधन नहीं, बल्कि भरोसे की व्यवस्था है। अच्छी बसें हैं, जलमार्ग से आने-जाने के लिए फेरी हैं, हवाई यात्रा सहज है। लोगों को कहीं जाने या रोज़मर्रा के कामकाज के लिए निकलने में तनाव नहीं होता। जो लोग शहर से 10–15 किलोमीटर दूर अपने कार्यस्थल या व्यवसायिक क्षेत्रों में जाते हैं, वे बिना झिझक पब्लिक ट्रांसपोर्ट चुनते हैं। इसकी वजह सिर्फ़ उपलब्धता नहीं, उसकी समयबद्धता और विश्वसनीयता भी है। साथ ही, पार्किंग का महंगा होना भी निजी वाहन के बजाय सार्वजनिक साधन अपनाने को प्रेरित करता है। यहाँ बड़ी संख्या में लोग साइकिल , जिसे यहाँ बाइक कहा जाता है , से भी आना-जाना करते हैं। साइकिल के लिए अलग पाथवे बने हुए हैं, जगह-जगह किराए पर साइकिल मिल जाती है और आप उसे एक जगह लेकर दूसरी जगह छोड़ सकते हैं।भारत के भी कुछ शहरों में ऐसी शुरुआत हुई है । भारत में डिजिटल भुगतान और ई-गवर्नेंस का चलन भले बढ़ा हो, लेकिन ऑस्ट्रेलिया में एक ही कार्ड से बस, ट्रेन, फेरी—सबमें यात्रा की जा सकती है। यह सुविधा आम आदमी के जीवन को कितना सरल बना देती है, इसका अंदाज़ा तभी लगता है जब आप खुद इसका उपयोग करते हैं।


मैंने सिडनी में Trubadur (Trpubadour) से Town Hall Bus Stop तक लगभग 44 किलोमीटर की यात्रा डबल डेकर बस से की। यह सफ़र सस्ता, सहज और बेहद आरामदायक था। इस दौरान मैंने सड़क मार्ग पर यातायात के लिए बनाए गए नियम, अनुशासित व्यवस्था, सड़क किनारे जंगलनुमा हरियाली, सुव्यवस्थित इमारतें और एक बड़े अंडरग्राउंड पुल के नीचे से गुजरने का अनुभव किया। बस की ऊपरी मंज़िल से पूरा शहर एक खुली किताब की तरह दिखाई देता है , जहाँ हर लेन, हर सिग्नल, हर पैदल यात्री के लिए जगह तय है। मुझे लगा कि हमारे देश के कितने ही नौकरशाह, नेता और नगरीय-ग्रामीण निकायों के प्रतिनिधि विदेश अध्ययन के नाम पर आते-जाते तो हैं, लेकिन लौटकर यहाँ देखी गई व्यवस्थाओं का ज़मीनी अमल बहुत ही कम हो पाता है। अगर पब्लिक ट्रांसपोर्ट के क्रियान्वयन में थोड़ी सी ईमानदारी और श्रम शामिल हो जाए तो कम से कम हमारी यातायात व्यवस्था तो बेहतर हो सकती है।
भारत में आबादी का दबाव अपनी जगह है, लेकिन बुनियादी संरचना, नियम और प्रक्रिया तो बेहतर बनाई ही जा सकती है। पहले हमारे यहाँ यात्रा का मतलब धार्मिक तीर्थ या सीमित पर्यटन होता था। अब नए साल, होली-दीवाली, बच्चों की छुट्टियों और लंबे वीकेंड पर लोग घूमने निकलने लगे हैं। फिर भी बड़ी आबादी आज भी अपने घर, गाँव, पंचायत, तहसील या ज़्यादा से ज़्यादा जिले तक ही सिमटी है। अगर देश की पूरी आबादी सचमुच गतिशील हो जाए -घूमे, सीखे, काम के लिए बाहर निकले तो क्या हमारे पास उतने पब्लिक और पर्सनल ट्रांसपोर्ट साधन या सड़कों का इंफ्रास्ट्रक्चर है? जवाब साफ़ है—नहीं। खास मौकों पर बसों, ट्रेनों और नावों में जो भीड़ और अव्यवस्था दिखती है, वह इस सच्चाई को उजागर कर देती है।और बड़ी दुर्घटनाएं भी इसी कारण होती हैं ।


मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में तो सड़क मार्ग के लिए राज्य परिवहन निगम समाप्त हो चुके हैं। भ्रष्टाचार और लालफीताशाही की भेंट चढ़े इन निगमों की जगह अब निजी ऑपरेटर आ गए हैं, जो सिर्फ़ मुनाफ़े वाली सड़कों पर ही गाड़ियाँ चलाते हैं। जीवन में अगर गतिशीलता न हो, तो ठहराव धीरे-धीरे जड़ता में बदल जाता है। नदी और समुद्र की लहरें हमें इसलिए आकर्षित करती हैं क्योंकि वे गतिशील हैं। हमारे यहाँ नदियों, तालाबों और पेड़ों की पूजा तो होती है, लेकिन उनके साथ व्यवहार बेहद बेरहम है। दुष्यंत कुमार का शेर याद आता है—“अब तो इस तालाब का पानी बदल दो, कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं।”


इसी यात्रा के दौरान, जब मैं बस से उतरकर सिडनी के ओपेरा हाउस के सामने पहुँचा, तो ओवरसीज पेसेजंर टर्मिनल पर खड़ा एक विशाल बहु-मंज़िला जहाज़ मेरी नज़र में ठहर गया—डिज़नी वंडर। यह 1999 में बना डिज़नी क्रूज़ लाइन का प्रसिद्ध जहाज़ है, जिसमें लगभग 2400 यात्री यात्रा कर सकते हैं। यह समुद्र में तैरता हुआ एक मल्टी-स्टोरी रिसॉर्ट है , जहाँ ड्राइंग रूम, मनोरंजन के अनेक स्थल, स्विमिंग पूल और अलग-अलग थीम्स मौजूद हैं। 2 फ़रवरी की शाम लगभग 6–7 बजे यह जहाज़ सिडनी से 15 दिनों की समुद्री यात्रा पर निकलने की तैयारी में था। इस यात्रा में न्यू कैलेडोनिया, फ़िजी, अमेरिकन समोआ होते हुए होनोलूलू तक जाने का कार्यक्रम था। ओपेरा हाउस की पृष्ठभूमि में खड़ा यह जहाज़ इसलिए भी वहाँ था कि यात्री विश्वप्रसिद्ध ओपेरा हाउस और हार्बर को देख सकें।


इस पूरी यात्रा और दृश्य ने मुझे यह सोचने पर मजबूर किया कि अगर हमारे जीवन में गतिशीलता है, तो उसके पीछे सहज साधन, भरोसेमंद व्यवस्था और अनुकूल वातावरण होता है। ऑस्ट्रेलिया में निजी टैक्सियाँ महंगी हैं, लेकिन पब्लिक ट्रांसपोर्ट सस्ता और विश्वसनीय है, इसलिए लोग उसे चुनते हैं। भारत में बढ़ते प्रदूषण, दिल्ली में ऑड-ईवन और सीएनजी जैसी कोशिशों के बावजूद हालात इसलिए नहीं सुधरते क्योंकि पब्लिक ट्रांसपोर्ट पर्याप्त और भरोसेमंद नहीं है। हर साल कारें बढ़ रही हैं, सड़कें वही हैं।


मैंने रायपुर और नए रायपुर में बने साइकिल ट्रैक भी देखे हैं, लेकिन उनकी दुर्गति किसी से छिपी नहीं। हमारे यहाँ योजनाएँ दीर्घकालिक सोच के बजाय तात्कालिक लाभ या दिखावे के लिए बनाई जाती हैं। अगर हम अपने देश, अपने शहर और अपने कस्बे के प्रति ईमानदार हों, तो ऐसी संरचनाएँ बनें कि बाहर से आने वाला व्यक्ति बिना यह जाने कि यहाँ किसकी सरकार है, सिर्फ़ व्यवस्था देखकर प्रभावित हो जाए । जैसा मैं यहाँ ऑस्ट्रेलिया में महसूस कर रहा हूँ।


शायद इसी वजह से हमारे देश के युवा बड़ी संख्या में विदेश जाकर बस जाते हैं। उन्हें अपने देश से प्रेम है, लेकिन वहाँ जो तंत्र, जो व्यवस्था, जो सहजता और खुली साँस लेने का माहौल मिलता है, वह उन्हें रोक लेता है। गतिशीलता केवल यात्रा नहीं है, यह जीवन को बहाव देती है और जहाँ बहाव होता है, वहाँ जीवन ठहरता नहीं, आगे बढ़ता है।

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