जैसे-जैसे जनवरी की ठंडी हवाएं तेज होती जा रही हैं, वैसे-वैसे देश की आर्थिक दुनिया में एक गर्माहट फैल रही है। जी हां, हम बात कर रहे हैं आगामी केंद्रीय बजट 2026-27 की, जो 1 फरवरी को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया जाएगा। यह बजट सिर्फ सरकारी खातों का हिसाब-किताब नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की उम्मीदों का आईना है। किसान से लेकर कॉर्पोरेट जगत तक, हर वर्ग की नजरें इस पर टिकी हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये अपेक्षाएं पूरी हो पाएंगी? या फिर फिस्कल डेफिसिट और आर्थिक चुनौतियों के बीच सरकार को संतुलन साधना पड़ेगा? आइए, इस पर गहराई से नजर डालते हैं, सरल शब्दों में, जैसे आप अपनी कॉफी की चुस्की के साथ अखबार पढ़ते हैं।
सबसे पहले बात मध्यम वर्ग की, जो देश की रीढ़ है लेकिन अक्सर बजट में ‘साइलेंट सफरर’ बन जाता है। सैलरीड क्लास की मुख्य अपेक्षा है टैक्स रिलीफ। स्टैंडर्ड डिडक्शन को 75,000 रुपये से बढ़ाकर 1 लाख रुपये करने की मांग जोरों पर है, ताकि महंगाई के इस दौर में जेब थोड़ी ढीली हो सके। लॉन्ग टर्म कैपिटल गेंस (LTCG) पर एक्सेम्प्शन लिमिट 1.25 लाख से 2 लाख रुपये तक बढ़ाने की उम्मीद भी है, खासकर शेयर मार्केट में निवेश करने वालों के लिए। स्वास्थ्य बीमा के तहत सेक्शन 80डी की डिडक्शन बढ़ाना और होम लोन इंटरेस्ट पर ज्यादा छूट भी लिस्ट में है। महिलाओं और सीनियर सिटीजन के लिए स्पेशल स्कीम्स, जैसे अलग से टैक्स बेनिफिट्स, की भी चर्चा है। लेकिन क्या ये पूरी होंगी? विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले साल की बड़ी राहत (12 लाख तक की इनकम टैक्स-फ्री) के बाद बड़े बदलाव कम ही संभावित हैं। सरकार फिस्कल डेफिसिट को 4.4% पर रखने की कोशिश में है, इसलिए टार्गेटेड रिलीफ जैसे LTCG एक्सेम्प्शन बढ़ाना तो हो सकता है, लेकिन व्यापक टैक्स कट्स मुश्किल।
अब किसानों और ग्रामीण भारत की ओर रुख करें। पिछले साल की बजट में कृषि पर फोकस था, लेकिन इस बार अपेक्षाएं और ऊंची हैं। फार्म इनकम्स बढ़ाने, सिंचाई योजनाओं में ज्यादा निवेश और फसल बीमा को मजबूत करने की मांग है। रूरल रिबाउंड की वजह से जीडीपी ग्रोथ 7.3% तक पहुंचने की उम्मीद है, लेकिन वैश्विक व्यापार अनिश्चितताओं से निर्यात प्रभावित हो रहा है। क्या सरकार कृषि सेक्टर को और बूस्ट देगी? संभावना है कि हां, क्योंकि ग्रामीण अर्थव्यवस्था अब मेट्रो-सेंट्रिक नहीं रह गई है। लेकिन बड़े पैमाने पर सब्सिडी बढ़ाना फिस्कल बैलेंस को बिगाड़ सकता है, इसलिए टार्गेटेड स्कीम्स जैसे एमएसपी पर फोकस ज्यादा होगा।
उद्योग जगत की अपेक्षाएं तो जैसे आसमान छू रही हैं। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ‘मेक इन इंडिया’ को और मजबूत करने की उम्मीद कर रहा है, जैसे हाई डेप्रिसिएशन रेट्स, इन्वेस्टमेंट इंसेंटिव्स और जीएसटी सिंपलीफिकेशन। डिफेंस सेक्टर में 10-12% कैपिटल आउटले बढ़ोतरी की बात है, जो स्वदेशी हथियारों और प्राइवेट कंपनियों को बूस्ट देगी। इंफ्रास्ट्रक्चर में रेलवे, रोड्स और पावर पर कैपेक्स पुश अपेक्षित है, जो प्राइवेट इन्वेस्टमेंट को आकर्षित करेगा। रिन्यूएबल एनर्जी में ग्रुप टैक्स कंसोलिडेशन और बैटरी एनर्जी स्टोरेज सिस्टम्स पर इंसेंटिव्स की मांग है। एआई, रोबोटिक्स और स्पेस सेक्टर को टैक्स ब्रेक्स मिल सकते हैं। लेकिन क्या ये पूरी होंगी? सरकार का फोकस स्ट्रैटेजिक सेक्टर्स पर है, जैसे डिफेंस और इंफ्रा, जहां 10-15% बढ़ोतरी संभावित है। हालांकि, ग्लोबल अनिश्चितताओं से एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर्स जैसे टेक्सटाइल्स और जेम्स को सपोर्ट मिल सकता है, लेकिन बड़े टैक्स कट्स कम ही दिख रहे हैं।
निवेशकों और स्टॉक मार्केट की दुनिया अलग ही है। यहां LTCG को 12.5% से घटाकर 5%, STCG को 20% से 10% और STT को खत्म करने की मांग जोरों पर है। इंडेक्सेशन बेनिफिट वापस लाने की भी उम्मीद है, ताकि इन्फ्लेशन से रियल प्रॉफिट पर टैक्स लगे। सोशल मीडिया पर तो जैसे बजट से पहले ही ‘रिलीफ रैली’ शुरू हो गई है! लेकिन वास्तविकता कड़वी है। सरकार टैक्स स्टेबिलिटी पर जोर दे रही है, और पिछले साल के दो टैक्स कट्स के बाद ज्यादा राहत मुश्किल। STT जैसी ‘फ्रिक्शनलेस’ रेवेन्यू स्ट्रीम बनी रहेगी, हालांकि LTCG एक्सेम्प्शन बढ़ाना संभव है। अगर बजट इंफ्रा और ईज ऑफ डूइंग बिजनेस पर फोकस करता है, तो मार्केट खुद बूम करेगा।
महिलाओं, युवाओं और गरीब वर्ग की अपेक्षाएं भी कम नहीं। महिलाओं के लिए स्पेशल स्कीम्स, जैसे जॉब क्रिएशन और एजुकेशन लोन्स में छूट। युवाओं को स्टार्टअप इंसेंटिव्स और टेक सेक्टर्स में पीएलआई स्कीम्स की उम्मीद है। गरीबों के लिए सोशल सिक्योरिटी और हाउसिंग डेफिनिशन को 75-90 लाख तक बढ़ाना। लेकिन सरकार की चुनौती है असमानताओं को कम करना – इनकम, वेल्थ और कंजम्प्शन में गैप बढ़ रहा है। प्राइवेट इन्वेस्टमेंट सुस्त है, हाउसहोल्ड सेविंग्स घटी हैं। जीडीपी ग्रोथ 7-7.5% पर है, लेकिन जॉब क्रिएशन के बिना सस्टेनेबल नहीं।
देखते हैं यह बजट उम्मीदों का बोझ उठाएगा, लेकिन वास्तविकताओं से जूझेगा। सरकार को फिस्कल कंसोलिडेशन, ग्रोथ और ग्लोबल चैलेंजेस का सामना करना है। बड़े बदलाव कम, लेकिन टार्गेटेड स्टेप्स ज्यादा होंगे। आखिरकार, बजट एक दस्तावेज नहीं, बल्कि देश की दिशा है। देखते हैं,1 फरवरी को क्या सरप्राइज मिलता है। तब तक, अपनी अपेक्षाओं को संभालिए और अर्थव्यवस्था पर नजर रखिए!
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