ऑस्ट्रेलिया के सिडनी से सुभाष मिश्र
आस्ट्रेलिया के सिडनी शहर के बेलमोरल (Balmoral) समुद्र तट पर वॉक करते हुए एक कटे हुए पेड़ पर लगी चेतावनी ने मुझे चौंका दिया। बोर्ड पर लिखा था—
“Tree vandalism has occurred in this area. To report mismanagement, contact council.”
यह सिर्फ़ एक सूचना नहीं थी, बल्कि एक सख़्त संदेश था कि यहाँ पेड़ काटना एक अपराध है, जिसे Tree Vandalism माना जाता है।

जब मैंने इस प्रकरण की जानकारी जुटाई, तो सामने आया कि समुद्र के सामने बन रहे कुछ महंगे बंगलों से रहने वालों को साफ़ sea view नहीं मिल रहा था। इसी कारण कुछ लोगों ने सामने खड़े घने और परिपक्व पेड़ों को हटाने की साज़िश रची। सीधे काटने के बजाय पेड़ों को केमिकल और दवाइयों के ज़रिये धीरे-धीरे मारने की कोशिश की गई।
यह घटना सिडनी के एक coastal public area में हुई थी। जैसे ही पेड़ों को नुकसान पहुँचने की बात सामने आई, local council, environmental committees, civil society और community groups तुरंत सक्रिय हो गए। मीडिया में सवाल उठे—
पेड़ किसने नष्ट किए?
किसकी अनुमति थी?
क्या यह कानून के भीतर किया गया?
यह मामला रुटीन ट्री-कटिंग नहीं माना गया, बल्कि खुले तौर पर इसे Tree Vandalism और कई स्तरों पर “Tree Murder” कहा गया। क्योंकि ये पेड़ केवल हरियाली नहीं थे—वे समुद्री कटाव रोकने, जैव विविधता बचाने और पर्यावरण संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभा रहे थे।

यह सवाल किसी सरकारी रिपोर्ट या NGO के दस्तावेज़ से नहीं, बल्कि एक प्रत्यक्ष अनुभव से सामने आया। सिडनी की यह घटना भारत के जंगलों, नदियों और विकास की दिशा पर गंभीर सवाल खड़े करती है।
भारत की ओर मुड़ता सवाल
जब यही सवाल भारत की तरफ़ मोड़ा जाए, तो तस्वीर 0बिल्कुल अलग दिखती है।
छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य से लेकर बस्तर तक बड़े पैमाने पर जंगल काटे गए। खनन, बिजली परियोजनाओं, सड़कों और औद्योगिक विकास के नाम पर हज़ारों पेड़ समाप्त कर दिए गए। स्थानीय लोगों ने आंदोलन किए, सड़क पर उतरे, अपनी ज़मीन और जंगल बचाने की आवाज़ उठाई—लेकिन ज़्यादातर मामलों में development की दलील के सामने उनकी बात अनसुनी रह गई।

मध्य प्रदेश में नर्मदा परियोजनाओं, हाईवे और अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर के लिए हज़ारों-लाखों पेड़ काटे गए। विस्थापन झेलने वालों ने सिर्फ़ अपनी ज़मीन ही नहीं, बल्कि जंगल और जीवनशैली भी खो दी। यह स्थिति केवल मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं है—पूरे देश में यही तस्वीर दिखाई देती है।
देशभर में रोज़ाना
पेड़ कटते हैं,
नदियों से अवैध रेत निकाली जाती है,
खनन और उत्खनन होता है—
लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर वैसी पर्यावरणीय चेतना नहीं बन पाती, जैसी हालात की गंभीरता मांगती है।
सिर्फ़ सिस्टम नहीं, समाज भी ज़िम्मेदार
इस संकट के लिए केवल सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं होगा। समाज का एक वर्ग भी इसमें शामिल है—
घर निर्माण,
सौंदर्यीकरण,
निजी ज़रूरतों के लिए
पेड़ काटे जाते हैं।
भारत में पर्यावरण और वन संरक्षण से जुड़े कानून मौजूद हैं, लेकिन या तो वे बहुत लचीले हैं या फिर उनका सख़्ती से पालन नहीं होता।
आस्ट्रेलिया से भारत को क्या सीखना चाहिए?
आस्ट्रेलिया में सवाल यह नहीं होता कि “पेड़ क्यों काटा गया?”
पहला सवाल होता है—
“पेड़ काटने का अधिकार किसने दिया?”
लोकल काउंसिल जवाबदेह होती है।
सिविल सोसाइटी दबाव बनाती है।
मीडिया लगातार निगरानी करता है।
यही संस्थागत और सामाजिक सजगता पर्यावरण संरक्षण को एक साझा जिम्मेदारी बनाती है, सिर्फ़ काग़ज़ी नीति नहीं।
यह लेख केवल ऑस्ट्रेलिया और भारत की तुलना नहीं है। यह एक चेतावनी है।
अगर विकास पर्यावरण की कीमत पर होगा, तो वह प्रगति नहीं, विनाश साबित होगा।
आज अगर पेड़ों की “हत्या” पर चुप्पी है,
तो कल हवा, पानी और ज़मीन हमसे जवाब माँगेंगे।
सिडनी में एक पेड़ कटता है तो पूरा सिस्टम जाग जाता है।
भारत में जंगल कटते हैं, तो हम आदत डाल लेते हैं।
सवाल सिर्फ़ पेड़ों का नहीं—
हमारी संवेदनशीलता और ज़िम्मेदारी का