
डॉ. इंदु साधवानी
बच्चों की भावनात्मक दुनिया बहुत नाज़ुक होती है। उनका आत्मविश्वास, व्यवहार, सीखने की क्षमता और जीवन को देखने का तरीका उन्हीं रिश्तों से आकार लेता है, जिनमें वे बड़े हो रहे होते हैं। परिवार में संवाद कैसा है, माता-पिता संघर्ष कैसे संभालते हैं, घर में प्यार कितना है, ये सभी बातें बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव डालती हैं। संवाद केवल बात करने का नाम नहीं, बल्कि दिल की बात सुनने और समझने की कला है। जब माता-पिता बच्चों को यह महसूस कराते हैं कि उनकी बातें महत्व रखती हैं, तो बच्चे खुलकर बोलना सीखते हैं और भीतर से सुरक्षित महसूस करते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि मातापिता और परिवारजन अपने बच्चों के साथ अधिक से अधिक समय व्यतीत करें और यह सुनिश्चित करें कि उस समय कोई इलेक्ट्रानिक गैजेट जैसे टीवी, मोबाइल, लेपटाप आदि उनके बीच में बाधा न बने.
बच्चों से बातचीत करने में पूरी संवेदनशीलता आवश्यक है, इसमें शब्द चयन, शब्दों की अभिव्यक्ति का स्वरूप और ध्यान महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. यदि बातचीत में कठोर शब्द, उपेक्षा या लगातार आलोचना हो तो बच्चों के मन में एक गहरी असुरक्षा पैदा करती है। वहीं, कोमल शब्द, धैर्य, स्वीकार्यता और गर्मजोशी उन्हें आत्मविश्वासी और भावनात्मक रूप से संतुलित बनाते हैं।

मानव व्यवहार में अच्छी बुरी दोनों परिस्थितियां उत्पन्न होना स्वाभाविक है. परिस्थितियों या अन्य कारणों से उत्पन्न मतभेद यदि परिवार जनों में हो, तब यह बच्चों की नजर में यह एक “सीख” बनकर उभरता है। यदि परिजन झगड़ों में एक-दूसरे को दोष देते हैं, चिल्लाते हैं या बात बंद कर देते हैं, तो बच्चे डर, बेचैनी और व्यवहारिक समस्याओं का सामना करते हैं।
इसके विपरीत, जब बड़े समझदारी से बात करते हैं, एक-दूसरे को सुनते हैं और शांत तरीके से समाधान ढूंढते हैं और जहां स्नेह की कमी नहीं होती, वहाँ बच्चे मानसिक रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से कुशल और भावनात्मक रूप से संतुलित बनते हैं।
हर बच्चा प्यार, स्पर्श, अपनापन और भावनात्मक सुरक्षा चाहता है। माता-पिता की गर्मजोशी और स्वीकार्यता बच्चों के मानसिक विकास की रीढ़ है। जहाँ बच्चे खुद को स्वीकार्य और महत्वपूर्ण महसूस करते हैं, वहाँ वे कम डरते हैं, कम चिड़चिड़े होते हैं और जीवन की हर परिस्थिति का सामना आत्मविश्वास के साथ करते हैं।
अक्सर परिजनों को पता भी नहीं होता कि बच्चे के मन में सबसे गहरा असर उसके भाई या बहन के व्यवहार से पड़ रहा है। यदि घर में संवाद खुला हो, माता-पिता का व्यवहार संतुलित हो और बच्चों को बराबर समय मिलता हो, तो भाई-बहनों में सहयोग और आत्मीयता बढ़ती है। वरना, प्रतियोगिता, ईर्ष्या और झगड़े उनके व्यक्तित्व पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ सकते हैं।
बात जब 21वीं सदी की हो तब यह बिना डिजिटल प्रभाव के पूर्ण नहीं हो सकती। आज जब बच्चे और बड़े दोनों ही स्क्रीन में खोए रहते हैं, ऐसे में परिजनों के साथ “गुणवत्ता वाला समय” रिश्तों की सबसे बड़ी दवा है। साथ में खाना, कहानी सुनना, टहलना, खेलना, ये छोटी-छोटी बातें बच्चों की यादों में बड़ी खुशी बनकर बसती हैं। यह समय बच्चों को यह संदेश देता है कि “मैं महत्वपूर्ण हूँ… मेरे लिए कोई है।” और यह प्रयास डिजिटल दुनियाँ के नकारात्मक प्रभावों से बच्चों को बचाता है, इसे आदत नहीं बनने देता साथ ही बच्चे अपने परिवार के लोगों से ही कौशल विकास सीखने में रुचि दिखतव हैं।
स्वस्थ रिश्ते अपने आप नहीं बनते; उन्हें समय, धैर्य और लगातार प्रयास की जरूरत होती है। यदि हर घर अपनी बातचीत में थोड़ी गर्मजोशी, संघर्षों में थोड़ी समझदारी और रोज़मर्रा की दौड़ में थोड़ा “साथ” जोड़ दे, तो बच्चों का बचपन ही नहीं, पूरा समाज बदल सकता है।