राजा रवि वर्मा: कला, संघर्ष और अभिव्यक्ति के जोखिम का रंगमंचीय पुनर्पाठ


भारतीय कला इतिहास में राजा रवि वर्मा और दादा साहब फाल्के ऐसे दो नाम हैं, जिन्होंने चित्रकला, प्रिंटिंग और सिनेमा—तीनों माध्यमों को जनमानस तक पहुँचाने का ऐतिहासिक कार्य किया। राजा रवि वर्मा ने देवताओं को मंदिरों की सीमाओं से निकालकर आम लोगों के घरों की दीवारों तक पहुँचाया। उन्होंने ईश्वर को रंग, आकार और मानवीय चेहरे दिए—ऐसे चेहरे, जो समाज के आसपास दिखाई देते थे। यही कारण था कि उनकी पेंटिंग्स कैलेंडर, पोस्टर और प्रिंट के रूप में घर-घर पहुँचीं।
लेकिन यह यात्रा आसान नहीं थी। राजा रवि वर्मा का तीखा विरोध हुआ। उनके स्टूडियो जलाए गए, प्रिंटिंग प्रेस में आग लगाई गई। उन पर आरोप लगे कि वे ईश्वर को अपने ढंग से “गढ़” रहे हैं और पाश्चात्य प्रभाव में भारतीय आस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं। सरस्वती जैसी देवियों को जिन स्त्रियों के रूप में उन्होंने चित्रित किया, उन्हीं स्त्रियों के नग्न चित्र बनाए जाने पर विवाद और गहरा गया। यह वही विरोध था, जो हर युग में कलाकार को झेलना पड़ता है—जब वह स्थापित धार्मिक, सामाजिक और नैतिक मानकों को चुनौती देता है।
इसी ऐतिहासिक और वैचारिक पृष्ठभूमि को केंद्र में रखते हुए रायपुर में “राष्ट्र रंग – संघ साधना के 100 वर्ष” आयोजन के तहत अखिल भारतीय चित्रकला कार्यशाला के दूसरे दिन राजा रवि वर्मा के जीवन, संघर्ष और दर्शन पर आधारित एक नाटक का मंचन किया गया। यह मंचन केवल एक जीवनी प्रस्तुति नहीं था, बल्कि कला की स्वतंत्रता और उसके जोखिमों पर एक विचारोत्तेजक संवाद भी था।
नाटक में राजा रवि वर्मा के उस विचार को प्रभावी ढंग से उकेरा गया—
“मैं व्यक्ति नहीं, उनके मनोभावों को पढ़ता हूँ।”
स्त्री को देवी के रूप में देखने की उनकी दृष्टि को एक गहन दार्शनिक यात्रा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जहाँ कला केवल सौंदर्य नहीं, बल्कि साधना बन जाती है।
यह विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा कि नाटक का मंचन दो दिवसीय चित्रकला कार्यशाला के समापन अवसर पर किया गया, जिसमें खैरागढ़ विश्वविद्यालय सहित छत्तीसगढ़ और देश के विभिन्न हिस्सों से आए युवा चित्रकार शामिल थे। कैनवास और रंगों में अपनी दुनिया रचने वाले इन कलाकारों के सामने एक चित्रकार के जीवन पर आधारित नाटक का मंचन होना, उन्हें यह समझाने का सशक्त माध्यम बना कि कला केवल रचना नहीं, बल्कि संघर्ष, जोखिम और धैर्य की साधना भी है।
नाटक का निर्देशन डॉ. आनंद कुमार पांडेय ने किया। मंचन के उपरांत पद्मश्री वासुदेव कामत (पूर्व अखिल भारतीय अध्यक्ष, संस्कार भारती एवं अंतरराष्ट्रीय चित्र साधक) ने कलाकारों और निर्देशक की सराहना करते हुए कहा कि यदि राष्ट्र को समझना है, तो अपनी कला और संस्कृति को समझना होगा। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि नाटक ने राजा रवि वर्मा के वास्तविक इतिहास को दर्शकों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए सनातन सांस्कृतिक चेतना की सशक्त पहचान स्थापित की है।
अभिनय की दृष्टि से नाटक दर्शकों को बांधने में सफल रहा। हालांकि यदि इसकी गति को और सघन किया जाए, दृश्यांतरण को थोड़ा और चुस्त बनाया जाए तथा अभिनय में अतिरिक्त अनुशासन जोड़ा जाए, तो यह प्रस्तुति और अधिक प्रभावशाली हो सकती है। यह आलोचना नहीं, बल्कि इस प्रयास को अगले स्तर तक ले जाने का रचनात्मक सुझाव है।
नाटक को जयश्री नायर के लाइव गायन ने अत्यंत प्रभावी बनाया।
रोहित श्रीवास्तव ने राजा रवि वर्मा की भूमिका को गंभीरता और संवेदनशीलता के साथ निभाया।
अन्य प्रमुख भूमिकाओं में—
माही गरचा (सुगंधा),
सत्यम वर्मा (वकील),
शताब्दी साहू (सरस्वती),
माया डहरिया (लक्ष्मी),
प्रांतिक केसरवानी (जज एवं अरुमुखम पिल्लै),
धर्मेंद्र रजक (थियोडोर जेनसन एवं बड़ौदा महाराज),
गजेंद्र साहू (राजा रवि वर्मा के अन्य रूप, व्यक्ति एवं रंगनाथन),
अयान रज़ा (आचार्य चिंतामणि एवं रामास्वामी नायकर),
तरुण (आईलियम तिरुनाल एवं व्यक्ति)
ने अपने-अपने किरदारों को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया। सभी कलाकारों की भूमिकाएँ दर्शकों द्वारा सराही गईं।
दर्शक दीर्घा में छत्तीसगढ़ साहित्य परिषद के अध्यक्ष शशांक शर्मा, रंगकर्मी योगेश अग्रवाल, योगेंद्र चौबे, डॉ. कुंज बिहारी शर्मा, रंजन मोडक, रिखी छत्री सहित अनेक रंगकर्मी, कलाकार और कला-साधक उपस्थित रहे। सभी ने नाटक के साथ-साथ कार्यशाला में बन रही पेंटिंग्स को भी देखा और सराहा।
रायपुर में यह प्रस्तुति डॉ. आनंद पांडेय और उनकी टीम के सतत नाट्य-प्रयासों की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। चाहे छत्तीसगढ़ का जशपुर हो या रायपुर, वे सीमित संसाधनों में भी रंगमंच को जीवित रखने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। खैरागढ़ से उच्च शिक्षा प्राप्त कर रंगमंच को चुनना और उस पर टिके रहना, अपने आप में एक सांस्कृतिक हस्तक्षेप है।
कार्यशाला के दूसरे दिन हुआ यह मंचन केवल एक नाटक नहीं था, बल्कि यह याद दिलाने वाला अनुभव था कि जब भी कोई कलाकार कुछ नया रचता है और स्थापित मान्यताओं को चुनौती देता है—तो उसे अभिव्यक्ति के खतरे उठाने ही पड़ते हैं। राजा रवि वर्मा का जीवन इसका सबसे सशक्त उदाहरण है।
संस्कार भारती छत्तीसगढ़ द्वारा आयोजित यह अखिल भारतीय चित्रकला कार्यशाला भारतीय कला परंपरा को सुदृढ़ करने की दिशा में एक सार्थक पहल सिद्ध हुई है—जहाँ कला, संवाद और रंगमंच एक-दूसरे के पूरक बनकर सामने आए।

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