सुखी कहानी का शेष भाग …. स्त्री संवाद

मनीषा तिवारी

मैंने अपने मालिकाना हक़ को जमाये रखने की कोशिश में फिर से अपने कमरे को निहारा और पाया कि मेरे घर की छत मजबूत कंकरीट ईंटो की हैँ और दरवाजे खिड़कियां हम अपनी सहूलियत से खोलते बंद करते हैँ. अचानक मुझे सुखी के घर का ध्यान आया.. टुटा छत, गंदे बोरे लगे दरवाजे और दफ़्ती चढ़ी खिड़कियां. मुझसे अब नही रहा गया और उससे पूछ बैठी…. सुखी… बाकी दो घरों में तुम्हारा आज का काम पूरा हो गया है? उसने कहा,  नही अभी एक घर जाना है… मैंने आश्चर्य मे उसकी ओर झुकते हुए फिर पूछा,  अभी रात के साढ़े नौ बजने वाले हैँ…तू कब यहाँ खाना पकाएगी, कब वहां जायेगी, देखा नही कितना समय हो रहा है?  उसने हमेशा की तरह सिर नीचे किये बड़े इत्मीनान भाव से कहा, जाउंगी जाउंगी सब जगह जाउंगी.  मैंने फिर पूछा.. ठीक है तो अपने घर कब जायेगी, कँहा पड़ता है तुम्हारा घर, पास है या दूर, तुम्हारे कितने बच्चे हैँ, क्या वो तुम्हे खोजते नही, क्या तुम अपने घर में खाना नही पकाती. वो सुनती रही और मुस्कुराती रही.

अब तक मैं उसके प्रति अपनी सोच के लेकर पूरी तरह आश्वस्त हो चुकि थी और उसकी ओर से अपने सोचे हुए जवाब के इंतज़ार में मैं उसपर सवालों की बौछार करने लगी…

वो क्षण भर रुक कर बोली.. अरे वो आज से नही शुरू से कहता है. मैंने पूछा कौन? वही मेरा पति; उसने आगे कहा; कहता है  कि तुम मेरे पास दो घंटे के लिए हीं तोआती हो. बोलते वक्त वो लजा रही थी, लेकिन उसकी आँखों में चमक थी और चेहरा ऐसा लग रहा था मानो  ओस की बूंदो के माफिक अभी पिघल कर हवा होजाएगा. एक पैर पालथी मार कर और दूसरे पैर को घुटनो से मोड़कर अपनी ठुड्डी से लगाते हुए उंगलियों से इशारे में जैसे किसी बच्चे को प्यार से डाटतें हुए पूछतें हैँ, उसने अपने पति की नक़ल करते हुए कहा… देखिये वो कहता है…. आज कँहा कँहा गयी, क्या क्या बनायी, क्या क्या खायी, दिनभर कँहा घूमी. फिर रुक कर बड़े अभिमान से अपनी हथेलियों को हवा में घुमाते हुए पहली बार आँखों में आँख मिलाकर उसने कहा उसको मेरी ख़ुशी में ही ख़ुशी है. ऐसा कहते वक्त मैंने उसके चहरे पर भरोसेमंद रिश्ते की  संतुष्टि देखी थी.

मेरी आँखे फटी रह गयी..मैंने कहा… अच्छा तो ये बात है… अब समझी, तुम्हारे स्वाभिभुत, बेपरवाह चेहरे का राज. मैंने आगे बोला, देखो पति यदि समझदार हो तो जीवन कितना आसान हो जाता है. वो सिर हिला कर आँख नीचे किये हुए हाँ में हाँ मिलाती रही और बोली, वो बैठा होगा अभी मेरे लिए. हमलोग साथ खाना खाएंगे, फिर सोयेंगे, सुबह हमलोग साथ काम पर निकलते है, दोपहर साथ घर लौटते हैँ. मैं उसे सुन रही रही थी , आत्ममुग्धता से इतराती हुई वो आगे बोली… अब पति के पास क्या जाए.. बच्चों को देखना है.  बात करते करते ही वो उठी और किचेन में चली गयी.

सुखी को सुनकर मैं मानव चरित्र की रचना, संरचना और उसके विज्ञान को समझ लेने की छटपटाहट में अपनी बेटी की किताबों को बेमतलब उलटती पुलटती रही और सोचती रही कि काश किताबें यदि सत्यनुभवों पर लिखी जातीं तो हम स्थापित परिकल्पनाओं कोअपनी सोच समझ का आधार बनाने से बच पाते और वास्तविकता के ज़्यादा करीब होते. मैं सुखी के प्रति अपनी सोच पर आत्मग्लानि से भर गयी थी. सुखी की बातों ने मुझे यह मानने पर मजबूर कर दिया था कि प्रेम का रूप  किसी समाज या वर्ग विशेष के  रहन सहन की परिपाटी में नहीं गढ़ा जाता  बल्कि यह निरपेक्ष भाव है और व्यक्ति परक है. मुझे अच्छा लग रहा था कि सुखी एक संजीदा और मित्रवत पति की संगिनी है. उसे देख कर ऐसा लगता है जैसे इनके बीच का अनकहा रोमांस इंद्रधनुष में लटके धूल के कणों की भांति सूरज की किरण पाते ही सात रंगों में चमक उठता है और ठंढी गर्म हवाओं में झूल जाता है.

दो तीन दिनों बाद मैं सुबह की धूप सेक रही थी और वो आयी. दिन की रौशनी में मैंने देखा कि उसके हाथ पैर बेहद सूखे खरोच भरे सफ़ेद सफ़ेद हो रहे थे. मुझे अजीब लगा, मैंने कहा हाथ पैरों में तेल क्यों नही लगाती,  अजीब रूखे हुए जा रहे हैँ.. वो कुछ सोची  फिर रुककर बोली…

जानती है, मुझे सुबह 4 बजे हीं सोकर उठने की आदत है, यदि किसी दिन मैं उठने में देर कर दी तो मेरे पति समझ जाएंगे कि मेरी तबियत ठीक नही है और वो सरसो तेल में लहसुन पका कर पुरे शरीर में मालिश करेंगे, और उस दिन मुझे काम पर नही जाने देंगे, खुद भी नही जाएंगे,. चेहरे पर चूहलपण लाते हुए उसने आगे कहा, लेकिन उसकी तेल मालिश के बाद मैं ठीक हो जाती हूँ और चुपके से काम पर निकल जाती हूँ, क्यों छुट्टी लेकर मैडम लोग को तकलीफ दूँ

उसने कहा मैं इधर निकलती हूँ और वो उधर मुझे खोजने लगता है. जब मैं वापस घर जाती हूँ उसके हांथो से बना खाना खाती हूँ. अक्सर मेरे बीमार होने पर वो मटन बनाता है और मेरा इंतज़ार करता है  बच्चों से कहता कि तुम्हारी माँ की तबियत ठीक नही है, मटन खाकर ठीक हो जाएगी.

सुखी की बातों को सुनते सुनते मैं क्रीम से पुते अपने हाथ पैरों में फिर से भर भर कर क्रीम मलने लगी.  अचानक सुखी ने क्रीम का डब्बा झपट कर मुझसे दूर रख दिया और अपने हाथो से मेरा सिर ऊपर उठा कर पूछा, आपको ये क्या हो जाता है? मैंने भी उसे देखा उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे.

मैं कुछ पूछती तभी उसने कहा, मैंने पिछले तीन सालों से कभी तेल नही लगाया, ना अपनी मर्जी का बनाया  खाया या उसकी मर्जी का हीं बनाया , मैं सुबह घर से निकलती हूँ, रात सोने घर जाती हूँ, दोपहर में घर जाऊँ तो लगता है वो मेरे आगे आगे जा रहा है, लेकिन कही दिखता नही, तो मैं बार बार पीछे मुड़कर उसे खोजती हूँ. शरीर से मेहनत करती हूँ बच्चों को पालना है. लेकिन मेरा मन यहाँ नही रहता. उसे ढूंढ़ कर लाने का मन करता है लेकिन वो इस दुनिया में होता तब तो….

मुझे अब कुछ भी नही पूछना था ना मैं कुछ कहना चाहती थी, ना उसकी ओर देखने की हिम्मत थी. मैं फर्श पर फैले पानी को देखती रही जो सुखी के पति के प्यार सा शांत, गहरा और तरल था लेकिन  चटकती धूम की गर्मी मे  चिंगारी बन बाहर चिटकने लगा था.

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