छत्तीसगढ़ में कॉनोकार्पस के रोपण पर प्रतिबंध

पर्यावरणीय जोखिम को देखते हुए वैज्ञानिकों ने जताई थी चिंता

राजकुमार मल

भाटापार–जिस कॉनोकार्पस के अनियंत्रित रोपण पर वानिकी वैज्ञानिक वर्षों से वैज्ञानिक समीक्षा की आवश्यकता बता रहे थे, उस पर अब छत्तीसगढ़ शासन ने प्रतिबंध लगा दिया है। तेज़ बढ़वार, सदाबहार स्वरूप और कम रखरखाव के कारण शहरी वृक्षारोपण में लोकप्रिय बनी यह विदेशी प्रजाति अब पारिस्थितिकी, आधारभूत संरचना और जनस्वास्थ्य पर संभावित प्रतिकूल प्रभावों के कारण चर्चा के केंद्र में है।

शहरी हरित पट्टियों में बड़े पैमाने पर लगाए गए कॉनोकार्पस के संबंध में विभिन्न राज्यों के अनुभवों तथा उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों से स्पष्ट हुआ कि इसकी आक्रामक जड़ प्रणाली, सीमित पारिस्थितिक उपयोगिता तथा संभावित स्वास्थ्य संबंधी प्रभावों को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर छत्तीसगढ़ शासन ने एहतियाती कदम उठाते हुए इसके नए रोपण पर रोक लगाने का निर्णय लिया है।

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आक्रामक जड़ प्रणाली

कॉनोकार्पस की जड़ें अत्यंत सशक्त एवं तेजी से फैलने वाली होती हैं। कई शहरों में इनसे भूमिगत पाइप लाइन, सीवर, नालियां, फुटपाथ तथा सड़क संरचनाओं को नुकसान पहुंचने की शिकायतें सामने आई हैं। सीमित स्थान वाले शहरी क्षेत्रों में यह समस्या भविष्य में भवनों की नींव और अन्य अधोसंरचनाओं को भी प्रभावित कर सकती है।

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जैव विविधता एवं स्वास्थ्य पर प्रभाव

उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार कॉनोकार्पस स्थानीय पक्षियों, मधुमक्खियों एवं तितलियों के लिए अपेक्षाकृत कम उपयोगी प्रजाति मानी जाती है। इसके फूलों में पराग एवं मकरंद की उपलब्धता सीमित होने से स्थानीय परागणकर्ता जीवों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाता। कुछ अध्ययनों में इसके परागकणों को संवेदनशील व्यक्तियों में एलर्जी एवं श्वसन संबंधी समस्याओं से भी जोड़ा गया है। यद्यपि इन प्रभावों की तीव्रता स्थान एवं परिस्थितियों के अनुसार भिन्न हो सकती है, फिर भी आबादी वाले क्षेत्रों में सावधानी बरतना उचित माना गया।

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अब छत्तीसगढ़ का निर्णय

गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों द्वारा कॉनोकार्पस के रोपण पर पहले ही प्रतिबंध या नियंत्रण संबंधी निर्णय लिए जा चुके हैं। अब छत्तीसगढ़ शासन ने भी वैज्ञानिक तथ्यों एवं दीर्घकालिक पर्यावरणीय हितों को ध्यान में रखते हुए इसके रोपण पर प्रतिबंध लागू किया है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित मानसून, लंबे शुष्क अंतराल तथा अल्प अवधि में अत्यधिक वर्षा जैसी परिस्थितियों में वृक्ष प्रजातियों का चयन केवल तेज बढ़वार के आधार पर नहीं, बल्कि उनकी पारिस्थितिक उपयोगिता, जलवायु अनुकूलता एवं जैव विविधता संरक्षण की क्षमता को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।

देशज वृक्ष ही होंगे भविष्य की हरित नीति का आधार

छत्तीसगढ़ शासन द्वारा कॉनोकार्पस पर प्रतिबंध वैज्ञानिक दृष्टि से एक दूरदर्शी निर्णय है। शहरी हरियाली केवल पेड़ों की संख्या बढ़ाने का विषय नहीं, बल्कि ऐसी हरित संरचना विकसित करने का प्रयास है जो जैव विविधता, जनस्वास्थ्य और शहरी अधोसंरचना—तीनों के लिए लाभकारी हो। प्रदेश में वृक्षारोपण के लिए नीम, करंज, अर्जुन, जामुन, कदंब, महुआ, हल्दू, शीशम, इमली तथा विभिन्न देशज बाँस प्रजातियों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। ये प्रजातियां स्थानीय जलवायु के अनुकूल होने के साथ पक्षियों, मधुमक्खियों, तितलियों तथा अन्य वन्यजीवों के लिए भी बेहतर आवास एवं भोजन उपलब्ध कराती हैं।

अजीत विलियम्स, साइंटिस्ट (फॉरेस्ट्री), बीटीसी कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर एंड रिसर्च स्टेशन, बिलासपुर

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