सनातन धर्म में मृत्यु के बाद दाह संस्कार को एक अत्यंत महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, इसी प्रक्रिया से मृतक की आत्मा को मुक्ति और शांति प्राप्त होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों में कुछ विशेष परिस्थितियों में शरीर को जलाना पूरी तरह वर्जित माना गया है? इन श्रेणियों में आने वाले व्यक्तियों के लिए दाह संस्कार के बजाय जल या भूमि समाधि का विधान बताया गया है।
इन 5 स्थितियों में नहीं होता दाह संस्कार
गरुड़ पुराण के अनुसार, यदि किसी महिला की मृत्यु गर्भावस्था के दौरान हो जाती है, तो उसका दाह संस्कार नहीं किया जाता। इसके पीछे एक व्यावहारिक कारण यह है कि शरीर जलने से गर्भस्थ शिशु को नुकसान पहुँच सकता है। ऐसे मामलों में उन्हें जमीन में दफनाना या जल समाधि देना ही उचित माना जाता है।
इसी प्रकार यदि किसी व्यक्ति की मृत्यु सांप के काटने या जहर के कारण होती है, तो उसे जलाया नहीं जाता। माना जाता है कि जहर के असर से शरीर में जीवन शक्ति कुछ दिनों तक बनी रहती है, इसलिए उसे पूर्णतः मृत नहीं माना जाता। 11 साल से कम उम्र के बच्चों का भी दाह संस्कार नहीं होता, क्योंकि उनका शरीर और आत्मा का बंधन बहुत कच्चा माना गया है।

संक्रामक रोग और संन्यासियों के अलग नियम
यदि किसी की मौत किसी गंभीर संक्रामक बीमारी से हुई हो, तो शव को जलाना खतरनाक हो सकता है। इससे बीमारी के कीटाणु हवा के माध्यम से फैल सकते हैं, इसलिए ऐसे शवों को भूमि में दफन करना सुरक्षित माना गया है। इसके अलावा, जो संत या ऋषि संसार का मोह त्यागकर सन्यास ले लेते हैं, उन्हें जलाया नहीं जाता। उन्हें दिव्य प्राणी मानकर जल या भूमि में समाहित कर दिया जाता है।