आज के दौर में स्मार्टफोन बच्चों के मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन बन चुका है, लेकिन स्क्रीन पर उंगलियों का लगातार स्क्रॉल होना मासूमों के मानसिक विकास के लिए एक मूक खतरा बनता जा रहा है। हालिया वैश्विक शोधों और वैज्ञानिक अध्ययनों में यह बात सामने आई है कि इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स और टिकटॉक जैसे शॉर्ट वीडियो प्लेटफॉर्म बच्चों की सोचने, समझने और किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित करने की क्षमता (अटेंशन स्पैन) को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं।
गोल्डफिश से भी कम हुआ इंसानी फोकस! तकनीकी दिग्गज माइक्रोसॉफ्ट के एक अध्ययन के अनुसार, डिजिटल क्रांति के इस दौर में इंसानों का औसत अटेंशन स्पैन साल 2000 के 12 सेकंड से घटकर अब मात्र 8 सेकंड रह गया है। हैरान करने वाली बात यह है कि यह एक छोटी सुनहरी मछली (गोल्डफिश) के 9 सेकंड के फोकस से भी कम है। 15 से 30 सेकंड के छोटे वीडियो देखने की आदत के कारण बच्चों का दिमाग इतनी तेज गति का आदी हो जाता है कि उन्हें स्कूल की क्लास, किताबें या परिवार के साथ लंबी बातचीत उबाऊ और थकाऊ लगने लगती है।
न्यूरोइमेजिंग में खुलासा: कैसे काम करता है ‘डिजिटल डोपामाइन लूप’? चीन की झेजियांग यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने जब एमआरआई (MRI) स्कैन के जरिए बच्चों के दिमाग पर शॉर्ट वीडियो के असर का अध्ययन किया, तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। वीडियो देखते समय दिमाग का ‘वेंट्रल टेगमेंटल एरिया’ (रिवॉर्ड पाथवे) तेजी से सक्रिय हो जाता है। हर नए वीडियो के साथ दिमाग में ‘डोपामाइन’ यानी ‘फील गुड केमिकल’ रिलीज होता है। चूंकि असल जिंदगी (जैसे पढ़ाई या खेल) में इतनी जल्दी इनाम या खुशी नहीं मिलती, इसलिए बच्चे बार-बार स्क्रीन की तरफ भागते हैं। विशेषज्ञ इसे एक खतरनाक ‘डिजिटल डोपामाइन लूप’ मानते हैं जो लत में बदल जाता है।
25 साल से पहले ‘टिकटॉक ब्रेन’ का खतरा दिग्गज अमेरिकी प्रकाशनों ‘द वॉल स्ट्रीट जर्नल’ और ‘फोर्ब्स’ ने इस मानसिक बदलाव को ‘टिकटॉक ब्रेन’ या ‘रील्स ब्रेन’ का नाम दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि निर्णय लेने और धैर्य रखने के लिए जिम्मेदार दिमाग का हिस्सा ‘प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स’ 25 साल की उम्र तक विकसित होता है। बचपन में ही इस लत का शिकार होने से बच्चों में आत्म-नियंत्रण की कमी हो रही है।
अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) की बड़ी चेतावनी एपीए के मुताबिक, जो बच्चे रोजाना 2 घंटे या उससे ज्यादा समय शॉर्ट वीडियो देखने में बिताते हैं, उनमें ये लक्षण तेजी से उभर रहे हैं:
- छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन और अत्यधिक गुस्सा।
- पढ़ाई में मन न लगना और याददाश्त का कमजोर होना।
- नींद न आना, बेचैनी और हर वक्त मोबाइल की चाहत।
- वास्तविक जीवन में तुरंत परिणाम न मिलने पर तनाव और अवसाद।
इस डिजिटल चक्रव्यूह से बच्चों को कैसे निकालें? बाल रोग विशेषज्ञों और टेक एक्सपर्ट्स ने इस लत से निपटने के लिए तीन अचूक मंत्र दिए हैं:
- नो गैजेट जोन और स्क्रीन-फ्री टाइम: घर में कुछ नियम तय करें, जैसे रात को भोजन करते समय और सोने से ठीक एक घंटे पहले परिवार का कोई भी सदस्य मोबाइल का इस्तेमाल नहीं करेगा।
- फिजिकल डोपामाइन को बढ़ावा: बच्चों को आभासी दुनिया की नकली खुशी से निकालकर असल जिंदगी के खेलों, संगीत, पेंटिंग या किताबों की दुनिया से जोड़ें ताकि उनका प्राकृतिक डोपामाइन एक्टिव हो।
- खुद रोल मॉडल बनें: बच्चे वही सीखते हैं जो देखते हैं। अगर माता-पिता खुद दिनभर फोन में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों को टोकना बेअसर होगा। डिजिटल दुनिया और वास्तविक जीवन में संतुलन बनाना अब समय की सबसे बड़ी मांग है।