आज के आधुनिक समय में शहरों की बात तो दूर, गांवों में भी कंक्रीट के बड़े-बड़े मकान बनने लगे हैं। इस नए दौर के निर्माण में हमारे घरों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यानी आंगन पूरी तरह गायब हो गया है। आज की नई पीढ़ी शायद ही जानती हो कि हमारी दादी-नानी के समय में हर घर के बीचों-बीच एक खुली जगह छोड़ी जाती थी। उत्तर भारत के पारंपरिक घरों से लेकर केरल के खास नाडुमुत्तम तक, पुराने समय में वास्तु और जीवनशैली के अनुसार खुली जगह बनाना बेहद जरूरी माना जाता था। आइए जानते हैं कि पुरानी पीढ़ी ने कितना सोच-समझकर इस परंपरा की शुरुआत की थी।
बिना बिजली के भी दिनभर घर को ठंडा रखता था यह देसी तरीका
पुराने समय में आज की तरह हर समय बिजली की सुविधा नहीं होती थी। यही वजह है कि घरों में प्राकृतिक रोशनी और ताजी हवा के सही तालमेल के लिए आंगन बनाया जाता था। विज्ञान की भाषा में कहें तो यह घर के तापमान को नियंत्रित करने वाले एक प्राकृतिक यंत्र की तरह काम करता था। दिनभर सूरज की रोशनी सीधे घर के बीच में पड़ती थी, जिससे कमरों में अंधेरा नहीं होता था। इसके अलावा, आंगन के खुले हिस्से से गर्म हवा आसानी से ऊपर आसमान की तरफ निकल जाती थी और घर के अंदर का वातावरण हमेशा ठंडा बना रहता था।
परिवार को आपस में जोड़ने का सबसे बड़ा जरिया
पहले के समय में ज्यादातर लोग संयुक्त परिवार में एक साथ रहते थे। ऐसे में घर का यह खुला हिस्सा पूरे परिवार को आपस में बांधकर रखने का काम करता था। दोपहर के समय घर की महिलाएं इसी खाली जगह पर चटाई बिछाकर बैठती थीं। यहाँ बैठकर वे आपस में बातें करती थीं, अचार-पापड़ सुखाती थीं और रात के खाने की तैयारी करती थीं। गर्मियों की रातों में पूरा परिवार यहीं बैठकर बातें करता था और बच्चे अपनी दादी-नानी से कहानियां सुनते थे। परिवार के सभी बड़े उत्सव जैसे शादी-ब्याह, मुंडन या त्योहार भी इसी खुले हिस्से में मनाए जाते थे।
महिलाओं की सुरक्षा और प्रकृति से सीधा जुड़ाव
पुराने जमाने में महिलाएं अक्सर पर्दे में रहा करती थीं। ऐसे में घर का यह अंदरूनी खुला हिस्सा उनके लिए एक सुरक्षित और निजी स्थान होता था, जहां वे बिना किसी बाहरी रोक-टोक या ताक-झांक के आराम से घूम-फिर सकती थीं। धार्मिक दृष्टिकोण से भी इसका बहुत बड़ा महत्व था। हर घर के इस हिस्से में तुलसी का पौधा जरूर लगाया जाता था, जहां सुबह-शाम दीया जलाया जाता था। यहाँ बैठकर लोग घर के अंदर से ही खुले आसमान, बारिश की बूंदों और रात में तारों को देख पाते थे, जो उन्हें प्रकृति के करीब रखता था।