​फॉल्ट या साजिश? अघोषित बिजली कटौती से भड़के ग्रामीणों का आधी रात को सब-स्टेशन पर धावा, 3 घंटे तक चला धरना

जनधारा संवाददाता अनूप वर्मा, चारमा जनधारा न्यूज (विशेष रिपोर्ट)

चारमा क्षेत्र: ग्रामीण इलाकों में पिछले कुछ समय से चल रही अघोषित बिजली कटौती और ‘रोज के रोज फॉल्ट’ के खेल से परेशान ग्रामीणों के सब्र का बांध आखिरकार शुक्रवार की रात टूट गया। घंटों तक अंधेरे में रहने को मजबूर आधा दर्जन से अधिक गांवों के लगभग 150 से 200 ग्रामीणों ने रात 10:00 बजे बिजली विभाग के कार्यालय (सब-स्टेशन) पर धावा बोल दिया और परिसर के सामने ही धरने पर बैठ गए। आक्रोशित ग्रामीणों ने विभाग के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और रात 1:00 बजे तक सब-स्टेशन को घेरे रखा।

शुक्रवार की रात क्यों फूटा ग्रामीणों का गुस्सा?

शुक्रवार को चारमा भाटापारा के एक ट्रांसफार्मर में खराबी आने के कारण रात लगभग 9:00 बजे अचानक बत्ती गुल हो गई। रोज-रोज की इस समस्या से तंग आ चुके ग्राम दरगहन, सिरसिदा, गिरहोला, बारगरी, नयपारा, चारभाटा और जैसाकर्रा के ग्रामीण जैसे-जैसे सूचना मिली, वैसे-वैसे एकजुट होकर बिजली दफ्तर की ओर कूच कर गए।

जब ग्रामीण दफ्तर पहुंचे, तो वहां केवल कुछ संविदा कर्मचारी ही मौजूद थे, क्योंकि बाकी अमला मैदानी स्तर पर फॉल्ट ढूंढने में लगा हुआ था। ग्रामीण रात 10:00 बजे से लेकर 1:00 बजे तक कार्यालय के सामने डटे रहे। रात करीब 12:00 बजे जूनियर इंजीनियर (JE) जयगोपाल कंवर भी मौके पर पहुंचे और उन्होंने ग्रामीणों को समझाने का प्रयास किया कि मैदानी अमला लगातार फॉल्ट को ढूंढकर उसे सुधारने के कार्य में जुटा हुआ है।

बिगड़ते माहौल को देख मौके पर पहुंची पुलिस, ग्रामीणों को दी समझाइश

आधी रात को इतनी बड़ी संख्या में ग्रामीणों के जुटने और बढ़ते आक्रोश के कारण सब-स्टेशन परिसर का माहौल लगातार गरमाता जा रहा था। लगातार हो रही तीखी नारेबाजी और बिगड़ते हालात की सूचना मिलते ही पुलिस टीम सुरक्षा व्यवस्था संभालने के लिए तत्काल मौके पर पहुंची।

आक्रोशित ग्रामीणों की भारी संख्या को देखते हुए पुलिस अधिकारियों ने मोर्चा संभाला और सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। इस दौरान पुलिस अधिकारियों ने ग्रामीणों से बात की, उनके गुस्से को शांत कराने का प्रयास किया और कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए ग्रामीणों को समझाइश भी दी।

ठेका पद्धति और निजीकरण की मार: 2017-18 के बाद से नहीं हुई रेगुलर भर्ती

इस पूरी समस्या के पीछे विभाग में अमले (स्टाफ) की भारी कमी एक बहुत बड़ी वजह है। अंदरखाने से मिल रही जानकारी के अनुसार, बिजली विभाग में साल 2017-18 के बाद से आज तक नियमित (रेगुलर) कर्मचारियों की कोई नई भर्ती नहीं की गई है। पूरे सिस्टम को अब ‘ठेका पद्धति’ और निजीकरण के हवाले कर दिया गया है।

पर्याप्त स्टाफ न होने का दंश खुद बिजली विभाग के कर्मचारी भी झेल रहे हैं, जो खुद इस अव्यवस्था से बेहद परेशान हैं। ठेकेदार अपने हिसाब से मुट्ठी भर लोगों से काम करवाते हैं। ऐसे में जब कोई फॉल्ट आता है, तो पर्याप्त कर्मचारी न होने के कारण घंटों तक सिर्फ फॉल्ट को ढूंढने में ही समय निकल जाता है।

बड़ा सवाल: मेंटेनेंस के नाम पर लो-क्वालिटी सामान का खेल और पुराने उपकरण

नागरिकों का कहना है कि हर साल बारिश शुरू होने से पहले विभाग मेंटेनेंस और सुधारीकरण के नाम पर घंटों बिजली बंद रखता है। लेकिन हकीकत यह है कि मैदानी स्तर पर लगे उपकरण और सामान काफी पुराने हो चुके हैं। कायदे से समय रहते इन पुराने सामानों को बदला जाना चाहिए, लेकिन विभाग इनके खराब होने और फॉल्ट आने का इंतजार करता है।

इसके साथ ही, जब से ठेका पद्धति और निजीकरण का बोलबाला बढ़ा है, विद्युत सामग्रियों की गुणवत्ता (क्वालिटी) के साथ जमकर खिलवाड़ किया जा रहा है। जिस उच्च स्तर (हाई क्वालिटी) के सामान और वायर लगाए जाने चाहिए, उनके बजाय ठेकेदारों द्वारा बेहद लो-क्वालिटी के सामान उपयोग किए जा रहे हैं। अधिकारियों और ठेकेदारों की कथित मिलीभगत के चलते यह घटिया सामान आसानी से पास भी हो जाता है, जिसका नतीजा यह होता है कि थोड़ा सा भी लोड बढ़ने पर पूरा सिस्टम जवाब दे जाता है और जंपर कटने व इंसुलेटर उड़ने जैसी समस्याएं रोज़ का नियम बन चुकी हैं।

विभाग का कहना: ‘देर से आई बरसात और बोर का बढ़ता लोड’

इस पूरे मामले पर विद्युत विभाग का कहना है कि इस साल अब तक ठीक से बरसात नहीं हो पाई है, जिसके कारण ग्रामीण क्षेत्रों में किसानों द्वारा बोर, पंप और अन्य बिजली उपकरणों का इस्तेमाल बहुत ज्यादा किया जा रहा है। विभाग के मुताबिक, अत्यधिक बिजली उपयोग के कारण अचानक लोड बढ़ रहा है, जिससे यह फॉल्ट आ रहे हैं। लेकिन यहाँ जनता का सीधा सवाल है कि यदि सामग्रियां अच्छी क्वालिटी की होतीं, तो क्या वे यह लोड नहीं संभाल पातीं? घटिया सामान लगाकर अंत में खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ रहा है।

12 से 15 घंटे की कटौती: ग्रामीण क्षेत्रों से ही सौतेला व्यवहार क्यों?

ग्रामीणों ने बिजली गुल रहने के रिकॉर्ड को लेकर सीधे तीखे सवाल दागे। उनका कहना था कि शुक्रवार को रात 9:00 बजे बंद हुई लाइट रात 1:15 बजे सुधरने के बाद आई, लेकिन यह केवल एक दिन की बात नहीं है।

  • इसके ठीक एक दिन पहले भी रात को 1:00 बजे light बंद हुई थी, जो अगले दिन दोपहर 2:00 से 3:00 बजे (लगभग 14 घंटे बाद) वापस आई।
  • उससे पहले भी लगातार 15-15 घंटे तक बिजली गुल रहने का रिकॉर्ड बन चुका है।

ग्रामीणों ने सबसे बड़ा सवाल यह उठाया कि क्या टेक्निकल फॉल्ट भी ग्रामीण और शहरी क्षेत्र देखकर आता है? शहरों में बिजली की स्थिति काफी हद तक ठीक रहती है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों को ही निशाना बनाकर प्रतिदिन घंटों और कभी-कभी पूरी रात अंधेरे में क्यों धकेल दिया जाता है? रात भर बिजली गुल रहने से लोगों की नींद प्रभावित हो रही है, जिससे उनके स्वास्थ्य, दैनिक रोजगार और बच्चों की पढ़ाई पर सीधा असर पड़ रहा है।

साजिश का आरोप: क्या सोलर पैनल बिकवाने के लिए जानबूझकर परेशान कर रही सरकार?

इस पूरे मामले में ग्रामीणों ने एक बेहद चौंकाने वाला और गंभीर आरोप भी लगाया। ग्रामीणों का कहना है कि बीते एक वर्ष पहले तक ऐसी स्थिति कभी नहीं होती थी। आंधी-तूफान में लाइट जाना समझ आता है, लेकिन अब बिना मौसम के रोज़ाना घंटों लाइट बंद रहती है।

चूंकि पिछले कुछ समय से सरकार द्वारा ‘सोलर पैनल’ लगाने का जमकर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है, इसलिए ग्रामीणों को आशंका है कि यह कोई सोची-समझी साजिश तो नहीं? क्या लोगों को बिजली कटौती से इस हद तक प्रताड़ित किया जा रहा है कि वे तंग आकर महंगे सोलर पैनल खरीदने की तरफ भागें?

अंतिम चेतावनी: नहीं सुधरे हालात तो होगा उग्र आंदोलन

रात लगभग सवा एक बजे जब फॉल्ट सुधारा गया और बिजली बहाल हुई, तब जाकर ग्रामीण शांत हुए। हालांकि, पुलिस और प्रशासन की समझाइश के बाद घर लौटने से पहले ग्रामीणों ने विद्युत विभाग को दो टूक शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि अघोषित कटौती का यह सिलसिला तुरंत बंद नहीं हुआ, तो आने वाले दिनों में बिजली दफ्तर का पूर्ण घेराव कर एक बड़ा और उग्र जन-आंदोलन खड़ा किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी प्रशासन की होगी।

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