विश्व जनसंख्या दिवस 2026: छत्तीसगढ़ में बेटियों का दबदबा, लेकिन इन औद्योगिक जिलों में घट रहा है ग्राफ

विश्व जनसंख्या दिवस पर जारी हुई ‘डेमोग्राफिक रिपोर्ट’ छत्तीसगढ़ के लिए गर्व और चिंता दोनों की मिली-जुली तस्वीर लेकर आई है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, छत्तीसगढ़ का ओवरऑल लिंगानुपात (Sex Ratio) प्रति 1000 पुरुषों पर 991 महिलाएं हैं, जो देश के राष्ट्रीय औसत (943) के मुकाबले काफी शानदार है।

लेकिन इस आंकड़े की गहराई में जाने पर सूबे की दो अलग-अलग तस्वीरें सामने आती हैं। एक तरफ जहां बस्तर के आदिवासी अंचलों में बेटियां, बेटों से आगे निकल गई हैं, वहीं दूसरी तरफ आर्थिक रूप से मजबूत और औद्योगिक जिलों में यह ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है।

बस्तर का कमाल: बेटियों की संख्या 1000 के पार
राज्य की कुल आबादी में लगभग 32% हिस्सेदारी रखने वाले आदिवासी बहुल इलाकों से सबसे सुखद आंकड़े आए हैं। यहाँ का सामाजिक ताना-बाना बेटियों के लिए वरदान साबित हो रहा है:

बस्तर: प्रति 1000 पुरुषों पर 1003 महिलाएं

दंतेवाड़ा: प्रति 1000 पुरुषों पर 1002 महिलाएं

नारायणपुर: प्रति 1000 पुरुषों पर 1001 महिलाएं

वजह: समाजशास्त्रियों के अनुसार, आदिवासी समाज में दहेज प्रथा का न होना, सामूहिक जीवनशैली, मातृसत्तात्मक परंपराएं और खेती-बाड़ी व घर में बेटियों की बराबरी की भूमिका ही इसकी मुख्य वजह है। यही कारण है कि यहाँ 0-6 वर्ष का बाल लिंगानुपात भी 970 से ऊपर बना हुआ है।

औद्योगिक जिलों की स्थिति चिंताजनक, शहरी इलाकों में डरावने आंकड़े
विकसित और औद्योगिक रूप से मजबूत मैदानी जिलों में शिक्षित आबादी होने के बावजूद बेटियों का ग्राफ 950 के आंकड़े को भी नहीं छू पा रहा है:

दुर्ग: लिंगानुपात गिरकर 946 पर पहुँचा

रायगढ़: आंकड़ा महज़ 959 पर अटका

कोरबा: यहाँ प्रति हजार पुरुषों पर केवल 961 महिलाएं हैं

सबसे डरावनी और चौंकाने वाली स्थिति शहरी क्षेत्रों के बाल लिंगानुपात (0-6 वर्ष) की है, जो खिसककर मात्र 918 पर आ गया है, जो सीधे तौर पर आधुनिक समाज की मानसिकता पर सवाल खड़े करता है।

सेहत के मोर्चे पर राहत, लेकिन राष्ट्रीय औसत से अब भी पीछे
रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया की इस रिपोर्ट में राज्य के स्वास्थ्य ढांचे को लेकर भी कुछ बड़ी बातें सामने आई हैं:

मातृ मृत्यु दर में सुधार: सूबे में अस्पतालों में होने वाले प्रसव (Institutional Delivery) की संख्या 90% से ज्यादा हो चुकी है। मितानिनों की ग्राउंड मेहनत की बदौलत मातृ मृत्यु दर प्रति लाख 159 से घटकर 132 पर आ गई है। हालांकि, इस सुधार के बाद भी छत्तीसगढ़ देश में 5वें नंबर पर है और राष्ट्रीय औसत (93) से काफी पीछे चल रहा है।

शिशु मृत्यु दर में देश में दूसरा स्थान: बच्चों की मौत के मामले में राज्य की स्थिति अब भी गंभीर है। हालांकि यह दर पहले के 77 से घटकर 38 (प्रति हजार) हुई है, लेकिन देश में छत्तीसगढ़ इस मामले में अभी भी दूसरे पायदान पर बना हुआ है।

विशेषज्ञों की राय: क्या है समाधान?
“ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएं पर्याप्त मजबूत न होने की वजह से हम शिशु मृत्यु दर के मामले में देश में दूसरे स्थान पर हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए सरकार को तुरंत बाल रोग विशेषज्ञों (Pediactricians) की भर्ती बढ़ानी होगी और सरकारी अस्पतालों में एनआईसीयू (NICU) और पीआईसीयू (PICU) वार्डों के नेटवर्क को और ज्यादा अपग्रेड करना होगा।”

— पद्मश्री डॉ. एटी दाबके (रिटायर्ड कुलपति एवं सीनियर पीडियाट्रिशियन)

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