सनातन धर्म में शंख को बहुत पवित्र माना गया है। पूजा-पाठ में शंख का विशेष स्थान है और इसके बिना अधिकांश अनुष्ठान अधूरे माने जाते हैं। शंख की उत्पत्ति समुद्र मंथन के दौरान निकले चौदह रत्नों में से हुई थी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शंख बजाने से घर की नकारात्मक ऊर्जा खत्म होती है और वातावरण शुद्ध होता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु को प्रिय शंख से शिवलिंग का अभिषेक करना वर्जित क्यों माना गया है?
भगवान शिव और शंखचूड़ का युद्ध
पौराणिक कथाओं के अनुसार, एक बार शंखचूड़ नाम के राक्षस ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर कब्जा कर लिया था। देवताओं के बहुत परेशान होने पर वे भगवान शिव की शरण में पहुंचे। देवताओं की रक्षा के लिए महादेव ने शंखचूड़ के साथ युद्ध किया और अंत में अपने त्रिशूल से उसका वध कर दिया।
हड्डियों से हुई शंख की उत्पत्ति
कथाओं के अनुसार, शंखचूड़ के मरने के बाद उसकी हड्डियों से शंख का निर्माण हुआ। इसी कारण शंख को उस राक्षस का प्रतीक माना जाता है। चूंकि भगवान शिव ने उसका वध किया था, इसलिए महादेव की पूजा में उसी के प्रतीक यानी शंख का उपयोग शुभ नहीं माना जाता है। शिवलिंग पर शंख से जल अर्पित न करने का स्पष्ट उल्लेख शिवपुराण की रुद्र संहिता में भी मिलता है।
विष्णु और लक्ष्मी को प्रिय है शंख
शंख भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी को अत्यंत प्रिय है। इसी कारण पूजा के दौरान विष्णु जी को शंख से जल अर्पित करना बहुत फलदायी माना जाता है। घर में शंख रखने और इसे नियमित बजाने से वास्तु दोष जैसी समस्याएं भी दूर होती हैं। हालांकि, महादेव के भक्त इस बात का विशेष ध्यान रखें कि शिवलिंग पर जल चढ़ाते समय शंख का प्रयोग न करें और अपनी श्रद्धा के अनुसार सादे पात्र से ही अभिषेक करें।