ज्येष्ठ महीने की पूर्णिमा तिथि को पूरे देश में वट पूर्णिमा के रूप में बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। इस खास और पवित्र दिन पर शादीशुदा महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए पूरे दिन का उपवास रखती हैं। सनातन धर्म और संस्कृति में इस व्रत को बहुत ही फलदायी और पवित्र माना गया है।

त्रिदेवों का वास है बरगद का पेड़
इस पावन त्योहार पर बरगद यानी वट के पेड़ की पूजा करने का एक विशेष और बड़ा महत्व है। धार्मिक मान्यताओं और पुराणों के अनुसार बरगद के पेड़ में ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं का वास होता है। यही वजह है कि महिलाएं पूरे नियम और विधि-विधान के साथ इस पूजनीय वृक्ष की पूजा-अर्चना करती हैं। वे पेड़ के चारों तरफ सूत का कच्चा धागा लपेटकर परिक्रमा करती हैं और अपने परिवार की खुशहाली की दुआ मांगती हैं। यह पर्व मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात और गोवा समेत पूरे पश्चिमी भारत में बड़े पैमाने पर मनाया जाता है।
अधूरी रहती है बिना कहानी के पूजा
इस व्रत को करने के साथ-साथ वट पूर्णिमा की पौराणिक कहानी सुनना या पढ़ना बेहद जरूरी माना जाता है। मान्यताओं के अनुसार बिना इस कथा को सुने व्रत का पूरा फल नहीं मिलता है। सदियों पुरानी कथा के अनुसार सावित्री नाम की एक बेहद विदुषी राजकुमारी थीं, जिन्होंने कम उम्र वाले सत्यवान से अपनी मर्जी से विवाह किया था। शादी के बाद वे राजमहल छोड़कर अपने पति के साथ जंगल में रहने लगीं और पति की लंबी आयु के लिए कठोर तप करने लगीं।
जब सावित्री ने यमराज को किया मजबूर
एक दिन जब सत्यवान जंगल में लकड़ी काट रहे थे, तभी अचानक उनके सिर में तेज दर्द हुआ और वे सावित्री की गोद में लेट गए। उसी समय मृत्यु के देवता यमराज वहां सत्यवान के प्राण लेने पहुंचे। यमराज जब सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे, तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चल दीं। सावित्री की अटूट भक्ति, साहस और बुद्धिमानी को देखकर यमराज बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने सावित्री को वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने बड़ी चतुराई से अपने पति के जीवन और सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांग लिया। अपने ही वचन में बंधने के कारण यमराज को सत्यवान के प्राण वापस लौटाने पड़े। इसके बाद सावित्री उसी बरगद के पेड़ के पास वापस आईं और सत्यवान दोबारा जीवित हो उठे। तभी से इस पावन व्रत की शुरुआत हुई।