स्वच्छ-ए भारत,सुंदर -भारत, विकसित – भारत, मोचो बस्तर सुंदर आसे और जमीनी हकीकत

जीवन एक यात्रा में मैने समाज के उसअंतिम व्यक्ति की पीड़ा को जनमानस तक पहुंचाने का प्रयास किया है। एक दंपति और साथ में उनके एक 2 वर्षीय मासूम बच्चे के तन पर कपड़ा का नहीं होना आत्म चिंतन का विषय और कई सवालों को जन्म देता है । जहां हम सुशासन तिहार विकसित भारत बस्तर मुन्ने जैसे सरकार साल दर साल अभियान चला रही है । और आज भी सुदूर अंचल में निवास रत कतिपय लोगों की माली हालात को बयां करता यह दृश्य ।
आइए पूरा पढ़े ।
— बस्तर मुन्ने ।।

यह तस्वीर छत्तीसगढ़ राज्य के कांकेर जिले के चारामा विकासखंड अंतर्गत ग्राम पूरी के साप्ताहिक हाट बाजार की है। तस्वीर में दिखाई दे रहा दंपति अपने नन्हें बालक के साथ समीपस्थ ग्राम नरसिंहपुर से दैनिक उपयोग की खाद्य सामग्री खरीदने बाजार पहुंचा है। पहली नजर में यह एक सामान्य ग्रामीण जीवन का दृश्य प्रतीत होता है, किंतु इसके भीतर छिपी सामाजिक और आर्थिक वास्तविकताएं कई गंभीर प्रश्न खड़े करती हैं।


जब देश “मेक इन इंडिया”, “विकसित भारत”, “शिक्षित भारत” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे महत्वाकांक्षी अभियानों की बात करता है, तब ऐसे दृश्य हमें यह सोचने पर विवश कर देते हैं कि विकास की रोशनी समाज के अंतिम व्यक्ति तक कितनी पहुंच पाई है। एक ओर सरकारें शिक्षा के अधिकार, भोजन के अधिकार, स्वास्थ्य सुविधाओं और गरीबी उन्मूलन के दावे करती हैं, वहीं दूसरी ओर ग्रामीण अंचलों में आज भी अनेक परिवार बुनियादी सुविधाओं, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन स्तर से वंचित दिखाई देते हैं।


यह तस्वीर केवल एक परिवार की नहीं, बल्कि उन लाखों ग्रामीण भारतीयों की कहानी कहती है जो आज भी अभाव, अशिक्षा और आर्थिक विषमताओं के बीच जीवनयापन कर रहे हैं। आधुनिकता और तकनीकी प्रगति के इस दौर में भी जब किसी नागरिक का जीवन न्यूनतम आवश्यकताओं के लिए संघर्षरत दिखाई देता है, तब विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर स्पष्ट रूप से सामने आ जाता है।


यह दृश्य हमें झकझोरता है, आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है और यह प्रश्न पूछता है कि क्या विकास का लाभ वास्तव में समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंच पाया है? यदि नहीं, तो अभी भी बहुत लंबा सफर तय किया जाना बाकी है।


एक विकसित राष्ट्र की पहचान केवल ऊंची इमारतों, चौड़ी सड़कों और बढ़ती अर्थव्यवस्था से नहीं होती, बल्कि उस अंतिम व्यक्ति के जीवन स्तर से होती है, जो समाज की मुख्यधारा से सबसे दूर खड़ा है। जब तक गांवों में रहने वाला हर परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सम्मानजनक जीवन के अवसरों से जुड़ नहीं जाता, तब तक विकास की यात्रा अधूरी रहेगी।


यह तस्वीर केवल एक दृश्य नहीं, बल्कि एक सवाल है—क्या भारत का विकास गांव के उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंच पाया है, जिसकी आंखों में आज भी बेहतर भविष्य की उम्मीद जीवित है?
भारत भाग्य विधाता।
संकलन एवं आलेख
यादों राम साहू
सिरसिदा चारामा जिला कांकेर ,
सामाजिक कार्यकर्ता

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