जमीनी हकीकत से कोसों दूर सरकार के दावे: ‘सुशासन तिहार’ और ‘बस्तर मुन्ने’ सिर्फ आवेदन बटोरने के केंद्र, जर्जर स्कूलों में दांव पर नौनिहालों का भविष्य

चारामा। प्रदेश सरकार एक तरफ डिजिटल इंडिया, शिक्षा में गुणवत्ता और ‘सुशासन तिहार’ जैसे आयोजनों का ढोल पीटकर रील्स में वाहवाही लूटने में व्यस्त है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत इतनी खौफनाक है कि मासूमों का भविष्य अंधकार में डूबा है। विकासखंड चारामा के ग्रामीण अंचलों में शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है।

हालत यह है कि कई गांवों में स्कूल भवन जर्जर होने के कारण उन पर सालों से ताला लटका है और बच्चे अतिरिक्त कक्षों में सिमट कर पढ़ने को मजबूर हैं। भैंसाकट्टा सहित पूरे विकासखंड में पिछले तीन-चार सालों से नए भवन और मरम्मत की माँग की जा रही है, लेकिन प्रशासन के कानों में जूं तक नहीं रेंग रही।

कागजों में गुणवत्ता का खेल: एकल शिक्षकों के भरोसे कैसे मजबूत होगी नौनिहालों की नींव?

प्रशासन भले ही कागजों पर नई-नई योजनाएं लाकर शिक्षा में ‘गुणवत्ता’ के बड़े-बड़े दावे करे, लेकिन हकीकत यह है कि विकासखंड के अधिकांश स्कूल एकल शिक्षक के भरोसे रेंग रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल बच्चों के भविष्य और शिक्षा के स्तर पर उठता है। जब पहली से पांचवीं तक के बच्चों को संभालने के लिए सिर्फ एक शिक्षक होगा, तो पढ़ाई की गुणवत्ता क्या खाक बचेगी?

यदि प्राथमिक स्तर पर ही बच्चों की नींव कमजोर रह जाएगी, तो ग्रामीण अंचल के ये गरीब बच्चे नवोदय और प्रयास जैसी प्रतिष्ठित प्रवेश परीक्षाओं को कैसे पास कर पाएंगे? जो बच्चे शुरुआत में ही पिछड़ जाएंगे, वे आगे चलकर 10वीं और 12वीं जैसी कठिन बोर्ड परीक्षाओं में अच्छे अंक कैसे लाएंगे? यही बच्चे आगे चलकर बड़ी प्रतियोगी परीक्षाओं (कंपटीशन) की दौड़ से पूरी तरह बाहर हो जाते हैं। सरकार अन्य गैर-जरूरी चीजों और आयोजनों में पानी की तरह पैसा बहा रही है, लेकिन जो शिक्षा समाज की सबसे मूलभूत और अनिवार्य आवश्यकता है, उसे पूरी तरह शून्य स्तर पर लाकर छोड़ दिया गया है।

एकल शिक्षक के भरोसे स्कूल: नन्हे-मुन्नों का भविष्य कैसे बनेगा?

इस अव्यवस्था का सबसे बड़ा उदाहरण ‘पूर्व प्राथमिक शाला शीतला पारा (गीतपहर)’ में देखने को मिल रहा है। यहाँ जनवरी महीने से जो दूसरी शिक्षिका पदस्थ थीं, वे अतिशेष प्रक्रिया के कारण स्कूल से हट गईं। तब से (पिछले 6 महीनों से) स्कूल के 60 वर्षीय उम्रदराज और पैर से दिव्यांग शिक्षक अकेले ही पूरी संस्था का भार संभाल रहे हैं।

एक अकेले दिव्यांग शिक्षक पर कक्षा पहली से पांचवीं तक के बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ बालवाड़ी को भी संभालने की दोहरी जिम्मेदारी है। अन्य कोई शिक्षक न होने के कारण पढ़ाई तो दूर, उन्हें अकेले ही मध्याह्न भोजन की व्यवस्था देखनी पड़ रही है, बच्चों को गणवेश (ड्रेस) और पाठ्यपुस्तकें बांटनी पड़ रही हैं, छात्रवृत्ति से जुड़े सारे कागजी काम करने पड़ रहे हैं और समय-समय पर होने वाली विभागीय बैठकों के लिए बीईओ तथा बीआरसी कार्यालय के चक्कर भी काटने पड़ रहे हैं। सवाल यह उठता है कि एक दिव्यांग और बुजुर्ग शिक्षक अकेले इतने सारे प्रशासनिक और शैक्षणिक काम कैसे संभाल पा रहा होगा? शासन-प्रशासन के पास क्या ऐसे संवेदनशील मामलों के लिए कोई नीति नहीं है?

विकासखंड के 70 से 80 स्कूल जर्जर: टपकती छतों के बीच पढ़ने को मजबूर बच्चे, हादसे का जिम्मेदार कौन?

इस पूरे मामले में जब खंड शिक्षा अधिकारी (बीईओ) केशव साहू से जानकारी ली गई, तो उन्होंने वस्तुस्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि पूरे विकासखंड में लगभग 70 से 80 स्कूल भवन जर्जर अवस्था में हैं, जिनकी मरम्मत या नए निर्माण की अत्यंत आवश्यकता है। पिछले वर्ष 2025 में ‘सुशासन तिहार’ के दौरान इसके लिए प्रस्ताव भेजे गए थे, लेकिन एक साल से अधिक समय बीतने के बाद भी स्वीकृति नहीं मिल पाई है। इस वर्ष फिर ‘बस्तर मुन्ने’ कार्यक्रम में ग्रामीणों ने उन्हीं पुरानी मांगों को लेकर दोबारा आवेदन सौंपे हैं। विकासखंड कार्यालय द्वारा लगातार उच्च स्तर पर पत्र भेजे जा रहे हैं, लेकिन निर्णय के नाम पर केवल फाइलों का खेल चल रहा है।

अब सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा को लेकर खड़ा होता है। 30-30 साल पुराने हो चुके ये भवन इस कदर जर्जर हैं कि बारिश के मौसम में छतों से लगातार पानी टपकता है। इसी सीलन और टपकते पानी के बीच मासूम बच्चे बैठने और पढ़ने को मजबूर हैं। ऐसे में यदि सीलन की वजह से बच्चों का स्वास्थ्य खराब होता है या वे बीमार पड़ते हैं, तो उनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी आखिर कौन लेगा? यही नहीं, ये खंडहर नुमा स्कूल कभी भी भरभरा कर गिर सकते हैं; यदि खुदा न खास्ता कोई बड़ा हादसा हो गया और किसी बच्चे की जान पर बन आई, तो शासन और प्रशासन में से इसकी जिम्मेदारी कौन उठाएगा? क्या प्रशासन को किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार है?

बीईओ का कहना: अतिशेष शिक्षकों की जल्द होगी पदस्थापना

शिक्षकों की भारी कमी पर बीईओ केशव साहू ने बताया कि नया शैक्षणिक सत्र शुरू हो चुका है। विकासखंड में जहां-जहां अतिशेष (सरप्लस) शिक्षक हैं, उन्हें कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी के अनुमोदन से जल्द ही इन एकल शिक्षकीय व शिक्षक विहीन स्कूलों में पदस्थ करने की प्रशासनिक प्रक्रिया की जा रही है, ताकि व्यवस्था सुधारी जा सके।

जनता पूछ रही सवाल: ‘डबल इंजन’ सरकार का यह ढुलमुल रवैया क्यों?

करोड़ों रुपए खर्च करके ‘सुशासन तिहार’ और ‘बस्तर मुन्ने’ जैसे तमाशे सिर्फ इसलिए आयोजित किए जा रहे हैं ताकि जनता से आवेदन कलेक्ट किए जा सकें? जिसे ‘डबल इंजन की सरकार’ कहा जाता है, उसका शिक्षा जैसे संवेदनशील विषय पर ऐसा ढुलमुल रवैया समझ से परे है। साल-साल भर पुराने आवेदनों का निराकरण करने के बजाय सरकार सिर्फ मीडिया और रील्स में हीरो बनकर समय काट रही है। क्या धरातल पर तड़पती इस शिक्षा व्यवस्था को कभी इंसाफ मिलेगा, या यह ‘सुशासन’ सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक ही सिमट कर दम तोड़ देगा?

विशेष रिपोर्ट: जनधारा संवाददाता अनूप कुमार वर्मा, चारामा

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