नई दिल्ली : राजनीति के अपराधीकरण को दूर करने और सार्वजनिक पदों पर शुचिता बनाए रखने के लिए लाए जा रहे ऐतिहासिक 130वें संविधान संशोधन विधेयक, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन (संशोधन) विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश सरकार (संशोधन) विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की महत्वपूर्ण बैठक दिल्ली सचिवालय में संपन्न हुई। समिति ने 11 बैठकों में गहन मंथन के बाद अब इस विधेयक की रिपोर्ट को सदन में आगे की चर्चा के लिए लोकसभाध्यक्ष ओम बिड़ला को सौंपने का निर्णय लिया है।

इस महत्वपूर्ण बैठक में रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने भी शामिल होकर विधेयक के सकारात्मक पहलुओं पर कई अहम सुझाव दिए। बैठक में उनके साथ सांसद अनुराग ठाकुर, असदुद्दीन ओवैसी, बृजलाल, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य और दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता सहित विभिन्न मंत्रालयों के वरिष्ठ अधिकारी और विधि विशेषज्ञ मौजूद रहे।

30 दिन जेल में रहने पर स्वतः खाली हो जाएगा मंत्री-मुख्यमंत्री का पद
संविधान (130वां संशोधन) विधेयक के तहत देश की राजनीति को साफ-सुथरा बनाने के लिए एक बड़ा प्रावधान किया जा रहा है। इसके अनुसार, यदि कोई मुख्यमंत्री या मंत्री किसी गंभीर अपराध (जिसमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान हो) के आरोप में गिरफ्तार होता है और लगातार 30 दिनों तक हिरासत में रहता है, तो उसे अपने पद से हटना होगा। यदि वे खुद पद नहीं छोड़ते हैं, तो 31वें दिन उनका पद स्वतः ही खाली मान लिया जाएगा। मुख्यमंत्री की सलाह पर उपराज्यपाल मंत्री को पद से हटाएंगे, और यदि स्वयं मुख्यमंत्री हिरासत में हैं, तो उन्हें अनिवार्य रूप से इस्तीफा देना होगा।

सिविल सेवा की तर्ज पर चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए भी बने नियम: बृजमोहन अग्रवाल
बैठक में सक्रिय भूमिका निभाने वाले रायपुर सांसद बृजमोहन अग्रवाल ने इस विधेयक का पुरजोर समर्थन करते हुए कहा कि भारतीय लोकतंत्र की धुरी ‘नैतिक वैधता’ पर टिकी है। सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों का आचरण कानून के सर्वोच्च आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए। उन्होंने तर्क दिया कि जिस तरह सिविल सेवाओं में 48 घंटे से अधिक की हिरासत होने पर सरकारी कर्मचारी को ‘स्वतः निलंबित’ (Deemed Suspension) मान लिया जाता है, ठीक उसी तरह जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों के लिए भी कड़े नियम होने चाहिए।

सांसद अग्रवाल ने कहा कि इस विधेयक में 30 दिनों की लंबी समय-सीमा और 5 वर्ष की सजा का मापदंड तय कर किसी भी प्रकार के मनमानेपन की आशंका को सीमित किया गया है। केंद्र सरकार ने इस बिल को पूरी तरह नैतिक तर्कों के साथ देश के सामने रखा है, ऐसे में सदन में इस जनहितैषी कदम का विरोध होना समझ से परे है। जेपीसी की अध्यक्ष अपराजिता सारंगी के मुताबिक, दिल्ली सहित देश के 9 राज्यों की सरकारों और मंत्रालयों के सुझावों को इस अंतिम रिपोर्ट में शामिल कर लिया गया है।