चिड़चिड़े, बेचैन और कभी-कभी आक्रामक… ऊष्मा प्रभाव के घेरे में अब पशु-पक्षी भी

राजकुमार मल, भाटापारा: छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ रही भीषण गर्मी का असर अब केवल इंसानों पर ही नहीं, बल्कि बेजुबान पशु-पक्षियों पर भी साफ दिखने लगा है। भाटापारा और आसपास के इलाकों में तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर जाने के बाद अब पशुधन और वन्य जीव ‘ऊष्मा प्रभाव’ (Heat Stroke) की चपेट में आ चुके हैं। गर्मी के कारण पशुओं की चाल धीमी हो गई है और उनकी सांसें तेज चल रही हैं। इसके साथ ही पक्षी भी इस जानलेवा गर्मी से बेहाल नजर आ रहे हैं।

चिकित्सकों के मुताबिक, पशुओं के व्यवहार में आ रहा यह हालिया बदलाव स्पष्ट कर रहा है कि तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा है। यदि गर्मी का यह दौर आगे भी ऐसा ही बना रहा, तो मामूली उत्तेजना पर भी पशु तीव्र और उग्र प्रतिक्रिया दे सकते हैं।

सहनशक्ति से बाहर हुआ तापमान

विशेषज्ञों के अनुसार, आमतौर पर पशुओं में 40 डिग्री सेल्सियस तक का तापमान सहने की क्षमता होती है। लेकिन इस समय पारा 44 से 45 डिग्री सेल्सियस के आसपास पहुंच चुका है। बीते चार-पांच दिनों से बने इस रिकॉर्डतोड़ तापमान के कारण पशुओं में चिड़चिड़ापन और बेचैनी चरम पर है। इसे चिकित्सकीय भाषा में ‘ऊष्मा तनाव’ (Heat Stress) कहा जाता है। यह स्थिति पशुओं को एकाएक आक्रामक बनाने के लिए मजबूर कर रही है।

धीमी चाल, तेज सांस और कम हुआ भोजन

उच्च तापमान के चलते प्रभावित पशु अब बहुत जल्दी थक जा रहे हैं। शरीर का तापमान संतुलित रखने के लिए वे लगातार तेज सांसें ले रहे हैं। हांफते हुए पशुओं के मुंह से अत्यधिक लार टपक रही है। बेचैनी इतनी अधिक है कि वे अचानक उग्र हो रहे हैं। इसके अलावा, गर्मी के तनाव के कारण मवेशियों ने सामान्य दिनों की तुलना में लगभग 10 से 15 फीसदी तक भोजन (चारा) कम कर दिया है।

पालतू पशुओं में दिख रहे ये असामान्य लक्षण

अत्यधिक हांफना, गुर्राना, बेचैनी और अचानक काटने की प्रवृत्ति सबसे ज्यादा श्वानों में देखी जा रही है। दूध देने वाले मवेशी चारा कम खा रहे हैं। इसके साथ ही वे बार-बार पूंछ हिलाने और जोर से पैर पटकने जैसी असामान्य हरकतें कर रहे हैं।

विशेषज्ञ की राय: छाया और पानी की व्यवस्था अनिवार्य

हम पशुओं के इस असामान्य व्यवहार पर लगातार नजर रखे हुए हैं। खासकर छोटे बच्चों (बछड़ों आदि) पर इस भीषण तापमान का बुरा असर पड़ने की आशंका ज्यादा है। सभी पशु मालिकों को सलाह दी जा रही है कि वे मवेशियों को केवल छायादार और ठंडी जगहों पर ही रखें और उनके लिए शुद्ध पेयजल की चौबीसों घंटे व्यवस्था करें।

डॉ. एस.एन. अग्रवाल, अतिरिक्त उपसंचालक, पशु चिकित्सालय भाटापारा

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