कल्याणकारी राज्य की विडंबना: छत्तीसगढ़ की स्थानीय प्रतिभाएं और ‘अस्थाई व्यवस्था’ का चक्रव्यूह

रायपुर। छत्तीसगढ़ समेत पूरे देश में युवाओं के भविष्य, सामाजिक सुरक्षा और लोक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) की अवधारणा को लेकर एक गंभीर वैचारिक बहस छिड़ गई है। यह विषय बेहद संवेदनशील और नीतिगत है, जो सीधे तौर पर राज्य के युवाओं के आत्मसम्मान और उनके अधिकारों से जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के पीछे मूल परिकल्पना यही थी कि यहां के जल, जंगल, जमीन और सबसे महत्वपूर्ण—यहां के ‘जन’ (स्थानीय प्रतिभाओं) को विकास के मुख्य पथ पर प्राथमिकता मिले। लेकिन स्थापना के ढाई दशकों बाद आज एक गंभीर वैचारिक और नीतिगत संकट खड़ा हो गया है। राज्य की मेधावी युवा शक्ति आज खुद को एक ऐसे प्रशासनिक चक्रव्यूह में फंसी हुई पा रही है, जहां ‘कल्याणकारी राज्य’ की नीतियां तो घोषित हैं, लेकिन धरातल पर काम करने वाले स्थानीय कर्मियों की सामाजिक और भविष्य की सुरक्षा दांव पर लगी है।

  1. ‘अस्थाई व्यवस्था’ का मायाजाल: निरंतरता और अनिश्चितता का द्वंद्व
    छत्तीसगढ़ के विभिन्न विभागों, विशेषकर उच्च शिक्षा और तकनीकी संस्थानों में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो पिछले 5, 7 या 10 वर्षों से निरंतर अपनी सेवाएं दे रहा है। लेकिन इस सेवा की प्रकृति को बार-बार तकनीकी और कानूनी नाम देकर बदला जाता रहा है:

नामांकन का चक्रव्यूह: कभी ‘मानदेय नीति’, कभी ‘अतिथि व्याख्याता/कर्मी’, कभी ‘संविदा’ तो कभी ‘आउटसोर्सिंग’।

निरंतरता पर प्रहार: नाम बदलने की इस प्रक्रिया से काम की निरंतरता तो बनी रहती है, लेकिन कर्मियों के अधिकारों की निरंतरता समाप्त हो जाती है। यह व्यवस्था प्रशासनिक रूप से सुविधाजनक हो सकती है, लेकिन मानवीय और सामाजिक दृष्टि से यह बेहद शोषणकारी है।

  1. प्रतिभा और प्रतिस्पर्धा का असमान धरातल
    स्थानीय युवाओं की एक बड़ी पीड़ा यह है कि राष्ट्रीय स्तर की प्रतिस्पर्धाओं में छत्तीसगढ़ के सुदूर और ग्रामीण अंचलों के युवाओं को वह ‘इकोसिस्टम’ (जैसे उच्च स्तरीय कोचिंग, संसाधन और शोध सुविधाएं) नहीं मिल पाता, जो महानगरों या अन्य राज्यों के अभ्यर्थियों को सुलभ है।

विश्वविद्यालयों की स्थिति: राज्य के विश्वविद्यालयों में शोध (Ph.D.) और उच्च पदों पर बाहर से आने वाले अभ्यर्थियों का चयन होना तकनीकी रूप से वैध हो सकता है, लेकिन यह स्थानीय प्रतिभाओं के लिए अवसरों को संकुचित करता है।

मानक (Standards) का खेल: कई बार ‘क्वालिटी और स्टैंडर्ड’ को मापने के नाम पर ऐसे नियम बना दिए जाते हैं जो स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में नहीं रखते। इसके कारण वर्षों से सेवाएं दे रहे अनुभवी स्थानीय कर्मी केवल कुछ तकनीकी अंकों या नए नियमों के कारण दौड़ से बाहर हो जाते हैं।

  1. लोक कल्याणकारी राज्य बनाम सामाजिक असुरक्षा
    भारतीय संविधान के तहत सरकारें ‘कल्याणकारी राज्य’ (Welfare State) के सिद्धांत पर काम करती हैं। छत्तीसगढ़ सरकार भी विभिन्न सामाजिक योजनाओं के माध्यम से करोड़ों रुपये की सुरक्षा और सब्सिडी दे रही है। लेकिन विडंबना देखिए:

जो युवा अपने जीवन के सबसे स्वर्णिम 7 से 10 वर्ष राज्य के निर्माण और शैक्षणिक ढांचे को मजबूत करने में लगा देते हैं, उनके पास न तो कोई पेंशन योजना है, न नौकरी की गारंटी और न ही कोई सामाजिक सुरक्षा।

यह नीतिगत विरोधाभास है—एक तरफ लोक-कल्याण का दावा और दूसरी तरफ राज्य के अपने ही ‘बौद्धिक श्रम’ का भविष्य अंधकार में छोड़ देना।

  1. न्यायिक और राजनीतिक दृष्टि: अब सूक्ष्म दृष्टिकोण की आवश्यकता
    इस पूरे परिदृश्य को केवल राजनीतिक बयानों या अदालतों के तकनीकी फैसलों के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। अब समय आ गया है कि न्यायपालिका और कार्यपालिका दोनों इस विषय पर अपना दृष्टिकोण बदलें:

क. न्यायिक दृष्टिकोण (Judicial Perspective)
न्यायालयों को केवल ‘प्रक्रियात्मक औपचारिकता’ (Procedural Formality) को देखने के बजाय ‘समान कार्य, समान गरिमा’ और ‘जीविकोपार्जन के अधिकार’ (Art. 21) के व्यापक संदर्भ में इसे देखना होगा। यदि कोई कर्मी लगातार कई वर्षों से सेवा दे रहा है, तो पद की आवश्यकता ‘अस्थाई’ नहीं बल्कि ‘स्थाई’ है। तकनीकी खामियों की आड़ में कर्मियों का नुकसान रोकना न्यायिक सक्रियता का हिस्सा होना चाहिए।

ख. राजनीतिक और नीतिगत सुधार (Policy Reforms)
राजनीतिक इच्छाशक्ति को ‘उपयोग करो और बाहर करो’ (Use and Discard) की मानसिकता से ऊपर उठना होगा। नई नियुक्तियां और वैकेंसियां अवश्य आएं, लेकिन उनमें:

वर्षों से सेवा दे रहे संविदा/अतिथि कर्मियों के अनुभव को उचित भारांश (Weightage) मिलना चाहिए।

स्थानीय युवाओं के लिए ‘डोमिसाइल’ (स्थानीय निवास) प्राथमिकताओं को कानूनी रूप से मजबूत किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष: सोच बदलने का समय
छत्तीसगढ़ का स्वाभिमान और उसका विकास यहां के युवाओं के आत्मसम्मान से जुड़ा है। यदि राज्य की मेधावी संतानें अपने ही घर में उपेक्षित महसूस करेंगी, तो यह न केवल एक प्रशासनिक विफलता होगी बल्कि एक सामाजिक त्रासदी भी होगी। कल्याणकारी राज्य का असली पैमाना यह होना चाहिए कि वह अपने अंतिम व्यक्ति के साथ-साथ अपने उस कर्मठ वर्ग को भी सुरक्षा दे जो व्यवस्था की रीढ़ है। अब नीतियों को सतही तौर पर नहीं, बल्कि सूक्ष्म और संवेदनात्मक रूप से बदलने की महती आवश्यकता है।

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